“उड़ना सिखाना ज़रूरी है, सहारा बनना नहीं।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश :
एक माँ अपने बगीचे में चिड़िया को अपने बच्चों को उड़ना सिखाते देखती है। वह दृश्य उसे अपनी ज़िंदगी का आईना लगता है, जहाँ वह अपने वयस्क बेटों को अब भी सहारा देती जा रही है। अंततः वह चिड़िया से कैसे प्रेरित होती है और कैसे अपने बेटों को आत्मनिर्भर बनाना सिखाती है, आइए विस्तार से जानें इस दिलचस्प और प्रेरक स्टोरी के जरिए—
सुबह की कोमल धूप आँगन में बिखरी थी। चाय की प्याली हाथ में थामे माया शर्मा नीम के पेड़ के नीचे बैठी थीं। पक्षियों की चहचहाहट में एक अनोखी बात थी — आज उस नीम पर एक छोटी-सी चिड़िया अपने नन्हे बच्चों को उड़ना सिखा रही थी।
माया मुस्कुराईं। वो दृश्य मानो उनके भीतर कहीं उतर रहा था।
चिड़िया अपने बच्चों के सामने उड़ान भरती, फिर लौटकर उन्हें पुकारती—
“चूँ… चूँ…”
बच्चे हिचकते, डरते, पंख फड़फड़ाते, पर उड़ नहीं पाते।
माया ने धीरे से कहा—
“अरे, बिलकुल मेरे आदित्य और राघव की तरह… उड़ना जानते हैं, पर कोशिश करने से डरते हैं।”
उनकी आँखें एक पल के लिए नम हो गईं।
पति का देहांत हुए दस साल हो चुके थे। उन्होंने अकेले दोनों बेटों को पाला, पढ़ाया, नोकरी ढूँढने तक में हाथ पकड़ा। लेकिन आज भी दोनों बेटे… बस माँ की छाया में जी रहे थे — आराम से, बिना संघर्ष के।
घर के सारे खर्च, बिजली, किराया, इंटरनेट… सब माया ही उठाती थीं।
कभी-कभी थकी साँसों में सोचतीं—
“क्या मैंने उन्हें उड़ान दी या आदत डाल दी… मेरे पंखों के नीचे रहने की?”
नीम की डाल पर चिड़िया ने फिर जोर से पुकारा।
एक बच्चा काँपा, झिझका… फिर उड़ा, गिरा, पर रुका नहीं।
थोड़ी देर में दोनों बच्चे उड़ने लगे।
और तभी, वो माँ चिड़िया… आसमान की ओर उड़ गई—दूर… बहुत दूर।
माया का दिल काँप गया।
“अरे! ये तो छोड़कर चली गई अपने बच्चों को!”
फिर जैसे किसी ने भीतर कहा—
“नहीं माया, उसने छोड़ा नहीं, भरोसा किया है। अपने बच्चों की उड़ान पर।”
माया की आँखें भर आईं।
वो खुद से बोलीं—
“कभी-कभी माँ का दूर जाना ही बच्चों के उड़ने की सबसे बड़ी वजह बनता है।”
शाम को घर में वही आलस था।
आदित्य सोफे पर मोबाइल चला रहा था,
राघव गेम में डूबा था।
माया ने धीरे से कहा—
“बेटा, उस कंपनी का फॉर्म भरा या नहीं?”
क्रमश: