जब लालच भूत बनकर लौटे, तो सच की रोशनी ही उसका अंत करती है।
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश :
एक कॉम्प्लेक्स में टोने-टोटके, रहस्यमयी मौत और हर रात दो बजे आने वाली भयानक सीढ़ियों की आवाजें रहवासियो को आतंकित कर देती हैं। लोग डर के मारे रात में निकलना बंद कर देते हैं और कॉम्पलेक्स का माहौल हर रोज शाम से ही भुतहा होने लगता है। क्या था इसका राज और किसने किया इसका पर्दाफाश ? आइए, विस्तार से जानें इस स्पाई थ्रिलर और हॉरर से भरपूर इस मनोरंजक स्टोरी में—
सूर्योदय कॉम्प्लेक्स—एक शांत, सुसंस्कृत और साफ-सुथरा इलाक़ा। यहाँ रहने वाले लोग शोर या परेशानी बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। लेकिन एक शाम शांति की इस दीवार में पहला दरार पड़ा, जब एक अजीब-सा आदमी कॉम्प्लेक्स में आया।
उसका नाम था—राघव त्रिपाठी।
दुबला-पतला, काली दाढ़ी, घूरने वाली आँखें और हमेशा अकेले रहने की आदत। उसने D-302 फ्लैट किराए पर लिया।
कॉम्प्लेक्स की महिला निवासी अनुराधा मेहता ने उसे पहली बार देखा तो फुसफुसाई—
“मुझे यह आदमी ठीक नहीं लगता, शैलजा। उसकी आँखों में कुछ… अजीब है।”
उसकी दोस्त शैलजा तिवारी बोली—
“हाँ, और वो रात में तीन-तीन बजे बालकनी में खड़ा होकर क्या बड़बड़ाता है? लग रहा था जैसे मंत्र…”
दोनों ने देखा, लेकिन अनदेखा कर दिया। उन्हें क्या पता था कि आने वाले दिनों में पूरा कॉम्प्लेक्स डर का अड्डा बन जाएगा।
⭐ टोने-टोटके की शुरुआत
तीन दिन बाद ही कॉम्प्लेक्स के कोने-कोने में अजीब चीज़ें दिखने लगीं—नींबू-मिर्च, राख की लकीरें, लाल कपड़े की पोटलियाँ, टूटे नारियल।
अनुराधा बोली—
“हे भगवान! ये क्या हो रहा है? ये सब सिर्फ़ D-ब्लॉक में ही क्यों है?”
शैलजा ने डरते हुए कहा—
“कहीं इस राघव का हाथ तो नहीं?”
धीरे-धीरे कॉम्प्लेक्स में डर फैलने लगा। बच्चे पार्क में खेलने से डरने लगे। महिलाएँ दरवाज़ों पर गंगाजल छिड़कने लगीं।
सबसे ज़्यादा परेशान थे—शर्मा जी, D-305 फ्लैट के मालिक।
वे बार-बार कहते—
“रात को कोई सीढ़ियों पर चलता है… भारी-भारी कदमों की आवाज़ आती है… कोई है यहाँ!”
लोग उनकी बात हँसी में उड़ा देते।
किसे पता था, कुछ ही दिन में यह हँसी चीखों में बदल जाएगी।
⭐ रहस्यमयी मौत
एक सुबह कॉम्प्लेक्स दहल उठा।
शर्मा जी अपने सोफे पर मृत मिले—आँखें बाहर निकली हुईं, चेहरा भय से टेढ़ा।
डॉक्टर ने कहा—
“हार्ट अटैक… लेकिन लगता है किसी भयानक चीज़ ने इन्हें पहले डरा दिया।”
अब सब डर गए। लोगों ने शर्माजी के अंतिम संस्कार के बाद शाम से ही अपने—अपने फ्लैट से बाहर निकलना बंद कर दिया।
इसके बाद तो रात में आवाज़ें और तेज़ होने लगीं।
क्रमश: