“जब रचनात्मकता थक जाए और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)आगे निकल जाए—एक लेखक की मौन पीड़ा।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर
सारांश:
एक रचनाकार अपनी सृजनशीलता के अचानक रुक जाने से जूझ रहा है, जहाँ शब्द उसके मन में आते ही शून्य हो जाते हैं। वह समझता है कि पिछले अनुभवों पर आधारित रचनाएँ अब समाप्त हो चुकी हैं, और ए.आई. के बढ़ते हस्तक्षेप से उसका आत्मविश्वास भी डगमगा उठा है। आधुनिक तकनीकी दौर में जहाँ कल्पनाशीलता मशीनों पर निर्भर होती जा रही है, वहीं असली रचनात्मकता को बचाए रखने की चुनौती बढ़ती जा रही है। ऐसे में रचनात्मक व्यक्तियों को क्या करना चाहिए? आइए विस्तार से जानें इस लेख में–
वह जैसे रुक गया था। उसकी सारी सृजन क्षमता जैसे रीत गई थी। उसने क्या क्या नहीं लिखा? क्या क्या नहीं खंगाला अपने मन मस्तिष्क से, अपने हृदय के संवेदनशील स्पंदनों से, अपनी कल्पनाओं से, अपने विगत अध्ययन के खजाने से। उसकी ढेरों रचनाएँ, कहानियाँ, कविताएँ आदि गवाह हैं कि उसने लिखने में कोई कोताही नहीं की है कभी। उसको सोशल मीडिया के साहित्यिक मंचों पर काफी प्रशंसा भी मिली है, ऑन लाइन प्रशस्ति पत्र भी मिले हैं और उसकी डिमांड भी है अभी तक। पर, अचानक वह कुछ भी लिखने जब बैठता है तो दिलो दिमाग से सब शून्य हो जाता है। कितनी बार कोई कविता लिखते हुये मिटानी पड़ी है। कोई कहानी लिखते लिखते जंची नहीं, हटानी पड़ी है। उसने अब तक जो लिखा था, अपने विगत अनुभवों के आधार पर लिखा था और लगता है उन सभी को वह वर्णित कर चुका है, अब कोई नया नहीं शेष रह गया है।
इसका अर्थ है उसने कभी दूसरों की रचनाएँ पढ़ने की जेहमत नहीं उठाई। बहुत सी रचनाएँ या तो उसे नकल लगती थी या कुछ बदलाव लिए दोहराई हुई लगती थी या सतही लगती थी जिनमें कोई नई बात नहीं मिलती थी और न कोई नया विचार उत्पन्न होता था। अत: वह उन्हें पढ़ते हुये भी छोड़ देता था। पुराना साहित्य बहुत उत्तम होते हुये भी इस नये युग से मेल नहीं खाता क्योंकि आधुनिक जमाने में बहुत बदलाव आ गए थे। हर बड़ा या छोटा रचनाकार अपने समय के उतार चढ़ावों से प्रेरित होता है और उसकी रचनाओं में उसके जमाने के अक्ष स्पष्ट नजर आते हैं।
आज जो आर्टिस्ट अपनी कल्पना शक्ति से कुछ नया पेश करने की कोशिश करे तो कल्पनाशीलता के एक से एक उत्तम कार्य
ए. आई. (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) की मदद से उपलब्ध हो जाते हैं और आर्टिस्ट के कार्य को धता बता देते हैं। यही आज साहित्य के क्षेत्र में और अन्य दूसरे कार्यों में ए. आई. का हस्तक्षेप दिनों दिन बढ़ता जा रहा है जिसके ढेरों उदाहरण सोशल मीडिया पर देखे जाते हैं। हालांकि अभी भी प्रबुद्ध वर्ग ये दावा करता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवीय संवेदनाओं की जगह नहीं ले सकती है परंतु इसकी परवाह करने वाले कौन और कितने लोग होंगे? इन बातों से उसकी रचनात्मकता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था और उसके दिलो दिमाग में कोई नई उपज नहीं आ पा रही थी। यह मान्य है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती, आदमी की ग्रहण करने की सीमा हो सकती है। बहुत कुछ जानने समझने के लिए बहुत कुछ अध्ययन करना पड़ता है लेकिन हर रचनाकार का भी एक क्षेत्र होता है और उसी क्षेत्र में उसकी क्षमताएं कियान्वित हो सकती हैं। इसके लिए अध्ययन क्षेत्र में भी विभिन्न विषय होते हैं। परंतु विशेषता कोई विषय ‘विशेष’ में ही मिलती है।
आज के दौर मेंं हजारों रील्स बन रही हैं, कृत्रिम बौद्धिकता की मदद से सैकड़ों वीडियोज़ बन रहे हैं। हर युवा, प्रौढ़ इन्हें अपनाकर, नये नये एप्स की मदद से चमत्कार पैदा करने में लगे हुये हैं। इस दौर में जहाँ नये नये क्रियेशंस बढ़ रहे हैं, वहीं मानसिक बीमारों के क्रियेशंस से अश्लीलता भी बढ़ रही है, डीप फेक विदियोज़ से धोख़ा धड़ी भी हो रही हैं। हालांकि सरकारी स्तर पर बैन लगाए जा रहे हैं किंतु अभी भी इस क्षेत्र में बहुत कुछ होना शेष है।
ये ठीक है कि किसी विषय, वाक्यांश या शब्द पर सप्रयास कुछ अच्छा आज भी रचित हो जाता है किंतु वर्तमान धारा को पकड़ कर चलना एक चुनौती बन गई है।
आज एक आम आदमी भी ए. आई. की मदद से बहुत कुछ रच सकता है और चमत्कार पैदा कर सकता है ऐसे में ये नहीं लगता कि स्वाभाविक रचना क्षमता कहीं सिकुड़ कर बैठ गई है। आज क्वान्टीटी का जोर तो है किंतु क्वालिटी मशीन पर आधारित हो रही है जहाँ व्यक्तिगत विशेषता बहुत कम परिलक्षित हो पा रही है। बहरहाल, देखते हैं यह दौर आगे आगे क्या गुल खिलाता है?