प्रेम की छुअन , धैर्य, पीड़ा और सत्य पर केंद्रित दो हृदयस्पर्शी गीत
डॉ. अशोक मधुप, नोएडा
सारांश:
पहला गीत प्रेम की गहराई और आत्मसमर्पण का प्रतीक है। कवि अपने को साधारण मानते हुए भी प्रिय की छुअन में चन्दन और कुंदन बनने की कामना करता है। विरह, अभिलाषा और जीवन की प्यास इस रचना में संवेदनशीलता से झलकती है। दूसरा गीत जीवन की विडंबनाओं, नैतिकता के ह्रास और अंतर्मन की पीड़ा को व्यक्त करता है। कवि स्वयं को साधारण मानते हुए भी सत्य, धैर्य और आदर्शों की राह पर चलता है। दुनिया के विष को पीकर भी वह उसे गीतों में अमृत में बदल देता है। आइए इन हृदसस्पर्शी गीतों का आनंद लें विस्तार से—
तुम छू लो चन्दन बन जाऊँ (गीत)
गंधहीन जीवन है मेरा,
तुम छू लो चन्दन बन जाऊँ।
तुम कंचन मैं निपट अकिंचन,
जैसे हो माटी का ढेला।
दास तुम्हारा वैभव, पर मैं
भरी भीड़ में खड़ा अकेला।
पारसमणि सी देह तुम्हारी,
तुम छू लो कुन्दन बन जाऊँ।
मीलों पता नहीं मंज़िल का,
पीड़ा मेरे संग अकेली।
सुन्दरता तेरी चेरी है,
ख़ुशियाँ तेरी सखी-सहेली।
जब भी तुम श्रृंगार करो तो,
मैं तेरा दरपन बन जाऊँ।
पनघट प्यासा, तन-मन प्यासा,
सारा जीवन ही प्यासा है।
कोई अभिलाषा है ऐसी,
तो यह केवल अभिलाषा है।
तुम यदि सावन बनकर बरसो,
तो मैं वृन्दावन बन जाऊँ।
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धरती जैसा धीरज मुझमें (गीत)
धरती जैसा धीरज मुझमें,
जग कहता अम्बर हूँ मैं।
जैसा बाहर से दिखता हूँ,
वैसा ही अन्दर हूँ मैं।
मन की व्यथा गीत बन गई,
तृष्णा लेकर प्यास न आई।
मरुथल सी हो गई ज़िन्दगी,
छाँव सुनहरी पास न आई।
आदर्शों के मोलभाव में, नैतिकता नीलाम हो गई,
मर्यादा के हाथों निष्ठा,
छली गई पर रास न आई।
राह सत्य की दुर्गम जिस पर,
चलना भी दुश्वार हुआ है,
न ही पीर पैगम्बर हूँ मैं,
न ही कोई रहबर हूँ मैं।
प्रश्न सभी अनुत्तरित रह गए,
अन्तर्मन का दर्द न जाना।
नैतिकता का ह्रास हो गया,
झूठ कपट का बढ़ा ज़माना।
किसको अपना कहें यहाँ पर,
कोई नहीं सहारा है अब,
पानी का बुलबुला है ये जग,
मैंने है केवल यह जाना।
ऊपर ऊपर वर्फ़ ढकी है,
भीतर ग़म का दरिया है।
पीर- ख़ज़ाना अन्तस्तल में,
गहरा इक सागर हूँ मैं।
भुजबन्धों से अनुबन्धों तक,
मैंने सारी उमर गँवाई।
दर्द और पीड़ा की स्याही,
भर करके लेखनी चलाई।
जो मिला गरल दुनिया से,
महादेव सा उसे पी गए,
विष को भी अमृत कर डाला,
गीतों में भर दी तरुणाई।
प्रेम सिन्धु के मन्थन में,
बन करके औघड़ वरदानी,
ज़हर पिया है मैंने लेकिन,
नहीं कोई शंकर हूँ मैं।
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उम्दा रचनाएँ।