“पूर्वजों की स्मृति ही हमारी संस्कृति की शक्ति है”
शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
सारांश:
पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और हमारी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। महाभारत काल से चली आ रही यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि अपनी जड़ों को याद करना ही भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। इन 16 दिनों तक किए जाने वाले श्राद्ध, तर्पण और दान के माध्यम से हम न केवल अपने पितरों को स्मरण करते हैं, बल्कि अपनी अगली पीढ़ी को भी यह शिक्षा देते हैं कि परिवार और संस्कृति ही जीवन का सबसे अमूल्य खज़ाना है। आइए विस्तार से जानें कृतज्ञता और श्रद्धा से भरे इस अनुष्ठान के बारे में—
पितृपक्ष / श्राद्ध पक्ष का इतिहास महाभारत काल से ही प्रचलित है। ऋषि अत्री ने ऋषि निमि को इसकी महिमा बताई थी। ऋषि निमि ने अपने पुत्र के स्वर्गवास के पश्चात् अपने पूर्वजों का आह्वान किया था तथा पूर्वजों ने ही उन्हें बताया था कि तुम्हारा पुत्र पितृलोक में पहुंच गया है। उसके बाद ऋषि निमि ने अपने पुत्र का श्राद्ध किया था। तभी से यह परंपरा हिंदुओं में चली आ रही है
श्राद्ध पक्ष 16 दिन तक चलता है। इन दिनों अपने पितरों का आह्वान किया जाता है। ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है तथा यथाशक्ति दान दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया जाता है। कोए को भी इन दिनों जिमाया जाता है। कहते हैं इन दिनों हमारे पितृ पृथ्वी लोक में आते हैं।
अत: हम सभी को अपनी संस्कृति, प्रथाओं, रीति रिवाजों को जीवंत रखने का यथासंभव प्रयास करना चाहिए और अपने पूर्वजों को मान सम्मान करते हुए अपनी आने वाली भावी पीढ़ी को इस संदर्भ में शिक्षित करना आवश्यक है ताकि ये हमारे भविष्य के पुरोधा हमारी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकें। सभी पितृजनों को मेरा सादर नमन! उन्हीं को समर्पित ये चंद पक्तियां:
पितरों को श्रद्धांजलि
भारत की ये परंपरा , इतने उच्च विचार
हमे धरोहर में मिला , उच्चतम यह संस्कार
मात पिता और वृद्ध जानों को,हम देते हैं मान
इतना ही न हम पितरों का ,करते हैं सम्मान
एक पक्ष तक हम पितर को ,मन से करते याद
ताकि अभी वो जहाँ भी बसते ,वहाँ रहे बस शाद
बनी रहे पितर की कृपा , करूँ मैं विनती आज
चाहे हों जिस लोक में बसते , दया करो महाराज
शबनम भी तो नहीं अछूती , करती हूँ प्रणाम
मेरे पितर थोड़ी कृपा , करना सुबह और शाम
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पितर वन्दना
हे मेरे पितर जी महाराज ,मैं करती शत शत हूँ प्रणाम
मेरा तुम बिन होवे न काज, मैं करती शत शत हूँ प्रणाम
मृत्यु लोक से ऊपर उठ कर
बैठे प्रभु के पास
निश दिन पड़ते प्रभु चरण पर
पितर जी तेरा हाथ
जरा तुम सुनो मेरी आवाज़, मैं करती शत शत हूँ प्रणाम
अपने कुल के हर प्राणी का
रखते प्रभु संग योग
हर इच्छा पूरी करवाने में
करते सहयोग
नहीं मैं कहती ये अकाज ,मैं करती शत शत हूँ प्रणाम
भोजन से सुगन्ध तुम लेते
लेते रस और जल
यही तुम्हारा भोजन है
जो रीत है सारा कुल
पूजे जाति और समाज,मैं करती शत शत हूँ प्रणाम
पितर को तर्पण करने से
रहते वे प्रसन्न
नही घटेगा आपके घर में
धन दौलत और अन्न
लो “शबनम”कहती हूँ मैं आज,
मेरे पितर जी महाराज ,
मैं करती शत शत हूँ प्रणाम
One Comment
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बहुत अच्छी प्रस्तुति। पितरों को तर्पण देते हुए उन्हें याद करना और उनके भले के लिए सोचना और वो हमें अपने भले के लिए आशीर्वाद दे यही हमारी परंपरा है।