“किताबें सजाने की नहीं, जीवन सँवारने की चीज़ हैं – यही सच्चाई है पुस्तक (झ)मेला।“
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश :
अब हमारी बिटिया चिलगोजा भले ही 12 वर्ष की हो गई हो, लेकिन पिछले दो वर्षों से वह पांचवीं क्लास में ही है। जब हमने उससे इस बारे में पूछताछ की तो उसने आंखें चमकाते हुए जवाब दिया— मम्मी! पीएचडी करने वाले तो पांच—पांच साल तक एक ही क्लास में पड़े रहते हैं। अभी तो मुझे पांचवीं क्लास में दो साल ही हुए हैं। जाहिर है, उसके इस जवाब ने हमेें लाजवाब कर दिया। फिर हमने उसकी हिदी की कॉपी का निरीक्षण किया तो उस पर ‘पुस्तक मेला”‘ टॉपिक पर दो रचनाएं मिली। इनमें से पहली तो कहानीनुमा है ओर दूसरी सटायर यानि हास्य—व्यंग्य की शैली में है! आइए किताबों से दूर रहने वाली जेन—एक्स में पैदा इस बच्ची की बस, दो मिनट में एआई से तैयार इन रचनाओं का आनंद लें और सोचें कि क्या ऐसी टैलेंटेड बच्ची को स्कूल द्वारा एक ही क्लास में दो साल तक रखा जाना चाहिए?
पुस्तक मेला (STORY STYLE)
“अरे सुनो-सुनो! आज शहर में पुस्तक मेला लगा है, चलो चलते हैं!”
मेरे इस सुझाव पर दोस्त हँसते हुए बोले –
“अबे, तू भी ना! ये किताब-विताब का जमाना रहा क्या? सबकुछ मोबाइल पर मिल जाता है।”
मैंने मुस्कराते हुए कहा –
“सही कहते हो दोस्त, सब मोबाइल पर मिल जाता है, लेकिन किताबें सिर्फ जानकारी नहीं, एहसास भी देती हैं। मोबाइल में स्क्रीन चमकती है, किताब में आत्मा झलकती है।”
खैर, मैं अकेला ही निकल पड़ा।
मेला जैसे ही नज़र आया, लगा जैसे किसी रंगीन सपनों की नगरी में आ गया हूँ। चारों तरफ़ किताबों के ढेर, अलग-अलग भाषाएँ, अलग-अलग लेखक, बच्चों के लिए रंगीन कहानियाँ, युवाओं के लिए उपन्यास, बुज़ुर्गों के लिए आध्यात्मिक ग्रंथ—जैसे पूरा ज्ञान समंदर एक जगह सिमट आया हो।
एक बच्चा उत्साह से बोला –
“मम्मी! देखो-देखो, यहाँ वाली किताब में तो पिक्चर भी है!”
माँ मुस्कराते हुए बोली –
“ले ले बेटा, ये किताब तुझे सिर्फ पिक्चर नहीं, सोच भी देगी।”
एक कोने में एक बुज़ुर्ग धीरे से अपनी पत्नी से कह रहे थे –
“याद है, जब हमारी शादी हुई थी, तुमने मुझे यही लेखक की किताब गिफ्ट की थी?”
पत्नी ने किताब उठाई, पलकों पर आंसू थे और होठों पर मुस्कान—
“हाँ, किताबें ही तो हैं जो वक्त और यादें संभालकर रख लेती हैं।”
लेकिन तभी एक बड़ा-सा बोर्ड दिखा – “विशेष छूट – सभी किताबें 50% तक सस्ती!”
यह पढ़ते ही मन थोड़ा भारी हो गया।
सोचा, क्या किताबें भी अब मोल-भाव का विषय बन गईं?
किताबों का मूल्य उनके दाम से नहीं, उनके असर से तय होना चाहिए।
फिर भी यह सोचकर संतोष हुआ कि छूट से शायद और लोग किताबें खरीद पाएँगे।
स्टॉल पर बैठे एक विक्रेता ने हंसते हुए कहा –
“भाई साहब, आजकल किताबें बिकती नहीं, बांटी जाती हैं। लोग कपड़ों पर हजारों खर्च कर देंगे, लेकिन किताब पर सौ रुपये भी भारी लगते हैं।”
मैंने किताब हाथ में लेकर उत्तर दिया –
“सच कह रहे हो, लेकिन कपड़े सिर्फ शरीर ढकते हैं, किताबें आत्मा को रोशन करती हैं।”
थोड़ी देर बाद मैं किताबों के बीच बैठ गया। पन्नों की खुशबू, छपी हुई स्याही की गंध, और शब्दों की दुनिया में खो जाने का अनुभव कुछ और ही था। लगा जैसे किताबें धीरे से कान में कह रही हों –
“हमें पढ़ो, हमें अपनाओ… हम तुम्हें वही देंगे जो कोई स्क्रीन नहीं दे सकती—गहराई, सुकून और अपना सा एहसास।”
वापस लौटते समय दोस्त ने पूछा –
“तो कैसा रहा पुस्तक मेला?”
मैंने मुस्कराकर कहा –
“मेले में किताबों ने हँसते-हँसते मुझे रुला दिया, और रुलाते-रुलाते समझा दिया कि जिंदगी के मेले में सबसे सच्चा साथी किताब ही है।”
✨ समापन संदेश:
किताबों की कीमत रुपये से नहीं आँकी जाती। वे जितनी भी सस्ती हों, असल में अनमोल होती हैं। एक अच्छी किताब जिंदगी बदल देती है—और यही है इस “पुस्तक मेले” का असली तोहफ़ा।
क्रमश:
(काल्पनिक रचना)
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Kitaabon ne humse jyada safar tay kiya h. Hum millennial n genz ne tw 20-30 ya jyada se jyada 40 years ka safar hi tay kiya h par kitabe tw sadiyon se yha par h. Meri favourite kitaab tw 1984 hi h.