“रहस्य से विज्ञान तक – एक कुएं की गहराई में छिपा सच!”
प्रस्तुति : शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश :
यह कहानी एक रहस्यमयी कुएं की है, जहाँ सफाई कर्मचारियों की संदिग्ध मौतें होती हैं और पूरा गाँव खौफ के साये में जी रहा होता है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, जादू, रहस्य और विज्ञान की परतें खुलती हैं, और अंत में सच्चाई सभी को चौंका देती है। आइए विस्तार सेजानें कैसे यह कहानी डर के माहौल से निकलकर वैज्ञानिक समझ और मानवीय भावनाओं से भरे सुखद अंत तक पहुँचती है–
राजस्थान के एक छोटे से गाँव पथारगढ़ में एक पुराना कुआँ था — “काला कुआँ”, जो नाम से ही डर पैदा करता था। गाँव वाले उसे अपशगुन मानते थे। किसी ने सुना था कि उसमें तंत्र-मंत्र किया गया था, किसी ने कहा वह ‘पाताल लोक’ का दरवाज़ा है। सच कुछ भी हो, लेकिन पिछले पाँच सालों में जो भी सफाई कर्मचारी उस कुएं की सफाई करने गया, वह जिंदा वापस नहीं लौटा।
“वो कुआँ जिंदा निगल जाता है!” — यह बात अब गाँव में आम हो गई थी।
पंचायत ने कुएं को लोहे की जंजीरों से बंद करवा दिया। लेकिन समस्या टली नहीं थी। कुएं से बदबू आती रहती थी, और बारिश में पानी भरने पर उसके आसपास की ज़मीन जहरीली हो जाती थी।
तभी राज्य सरकार की ओर से एक नया युवा इंजीनियर गाँव में तैनात हुआ — अविनाश त्रिपाठी, जो पर्यावरण विज्ञान और जल प्रबंधन में प्रशिक्षित था।
अविनाश ने गाँव वालों से कुएं की कहानियाँ सुनीं। उसने सोचा — “कोई बात तो है। या तो गाँव वाले सही हैं, या विज्ञान को अभी कुछ समझना बाकी है।”
पंचायत बैठक में उसने घोषणा की, “मैं खुद कुएं की जांच करूंगा।”
लोगों ने डर से मना किया। “महाराज, आप पढ़े-लिखे हैं, लेकिन उस कुएं ने बड़े-बड़े अफसरों को लील लिया है!” — बुज़ुर्ग हरदीन ने कहा।
पर अविनाश अड़ा रहा। उसने जिला मुख्यालय से गैस डिटेक्टर, सुरक्षा सूट, ड्रोन और एक तकनीकी टीम मँगवाई। साथ में आया एक लोकल डॉक्टर — डॉ. शशांक, जो ज़हर और गैस से जुड़ी बीमारियों में विशेषज्ञ था।
सुरक्षा इंतज़ाम के बाद, दिन तय हुआ — रविवार सुबह 6 बजे।
सूरज की पहली किरण के साथ गाँव के लोग ‘काले कुएं’ के पास इकट्ठा हुए। हर किसी की सांसें अटकी थीं। पूरे गाँव में सन्नाटा था। कुछ महिलाएं मंगल पाठ कर रही थीं, तो कुछ बच्चे पेड़ों के पीछे से झाँक रहे थे।
अविनाश ने सुरक्षा सूट पहना, ऑक्सीजन टैंक कंधे पर लादा और गैस सेंसर ऑन किया।
क्रमश: