सुशीला तिवारी, पश्चिम गांव, रायबरेली
“बंधन सिर्फ राखी का नहीं, भावनाओं का भी है।”
सारांश :
“रक्षा का बंधन” और “अपनत्व का बंधन” – दो भावपूर्ण रचनाएं जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते, मां-पिता के स्नेह, मायके की यादों और सावन की खुशबू से जुड़ी हैं। पढ़िए ये दो संवेदनशील शब्दचित्र जो हर दिल को छू लेंगे।
रक्षा का बंधन
रक्षाबंधन का त्योहार !
आज मां के बिना पहली बार रक्षा सूत्र बांध कर भाई को दरवाजे पर आ गई, यकायक कदम ठिठक कर रूकने को मजबूर हो गए
मुड़कर आंगन की तरफ देखा , मां ,बाबू जी की तस्वीर को निहारा फिर वापस लौटकर चली गई,
मैं रूकने के लिए नही रूकी ,बल्कि ये देखने के लिए कुछ सामान छूट तो नही गया ।
अब मां नही रही जो बतायेगी तुम्हारा क्या रह गया है, अब चल पड़ी अनजान पथिक सी ,न कोई कारवां, न कोई सांत्वना, निर्जन उदास मन बस मंज़िल थी ससुराल की,
दरवाजे पर बेचैनी से थोड़ा चहलकदमी करने लगी ।
तभी सहसा भाभी ने मजाकिया अंदाज में आवाज दी ,
दीदी क्या ले जा रही हो ?
मैंने कहा बहुत कुछ मायके की यादें ,अम्मा का निस्वार्थ प्रेम ,
और साडी का पल्लू लहराते हुए
ये अम्मा की साड़ी , पिता की नसीहत ,भाई का स्नेह ,भतीजा भतीजी का दुलार, भाभी का आदर-सम्मान
सबकुछ जिसे भुला नही सकती ,
कभी भी जीवन पर्यन्त
ये सुनकर भाभी भी भावनात्मक उदास हो गई, झुककर चरण स्पर्श किया ,
आशीर्वाद देकर मैं चल पड़ी सबकुछ समेट कर अपने गन्तव्य की ओर !
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अपनत्व का बंधन
सावन मास लेकर आता है,, त्यौहार रक्षाबंधन ,
भाई-बहन के संग प्रेम और अपनत्व का बंधन ।
हरियाली मन खूब लुभाती ,पेड़ पर पड़ते झुले ,
मिल के सखियां कजरी गायें, दुख के पल भूले ,
हांथ में मेंहदी पांव महावर,सावन मास सुहावन ।
भाई-बहन के संग प्रेम और अपनत्व का बन्धन ।।
ये पावन पुनीत पर्व शुभ,है भाई-बहन का प्यार ,
राखी को बांधे बहना,भइया देते हैं सुंदर उपहार,
हर्ष और उल्लास से हो, भाई घर बहन आगमन ।
भाई-बहन के संग ,प्रेम और अपनत्व का बन्धन ।।
बेसब्री से इस दिन एक दूजे का करते इन्तजार ,
सुख-दुख से परे ये रिश्ता, , हर बन्धन है स्वीकार ,
खुशी मायके की भाई है ,ससुराल का है साजन ।
भाई-बहन के संग, प्रेम और अपनत्व का बन्धन ।।
मन से मन का भाव लिए,अपनत्व भरा समर्पण ।
भाई-बहन के संग प्रेम, और अपनत्व का बन्धन ।।