प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
कर्ज़ की किस्तों में बँटी पीढ़ियों की सोच – जब ‘बचत’ और ‘EMI’ आमने-सामने हों!
सारांश:
पीढ़ियाँ बदलती हैं, पर सोचों की टकराहट हमेशा बनी रहती है।
जहाँ एक पीढ़ी ज़रूरतों में खुश थी, अगली पीढ़ी इच्छाओं को प्राथमिकता देती है।
पर समय के साथ सबको एहसास होता है — उधारी की ज़िंदगी कभी स्थायी सुख नहीं देती। आइए पढ़ें यह मनोरंजक रचना विस्तार से—
रमापति मिश्रा जी सुबह-सुबह चाय के साथ अख़बार में मोबाइल की एक शानदार स्कीम पढ़कर भड़क उठे। बोले—”बाप रे! 16 हज़ार की किस्त पर मोबाइल? 16 की उम्र में हम मिट्टी के खिलौनों से खेलते थे और आज के बच्चे लोन पे iPhone ले रहे हैं!”
बगल में बैठा उनका पोता युवराज मिश्रा, कानों में AirPods ठूंसे, बड़े ठाठ से बोला—”दादा, इमोशनल क्यों हो रहे हो? EMI है न, सबकुछ मुमकिन है!”
रमापति जी को लगा जैसे किसी ने बचत के देवता की मूर्ति पर पत्थर मार दिया हो। बोले—”हमारे जमाने में कर्ज़ लेना मतलब समाज में बदनामी की गारंटी थी। और आजकल? लड़के-लड़कियाँ शादी से पहले लोन ले लेते हैं, और हनीमून पर क्रेडिट कार्ड से जाते हैं!”
युवराज बोला—”दादा, अब सबकुछ डिजिटल है। पर्सनल लोन, होम लोन, कार लोन, ट्रैवल लोन, और अब तो शादी लोन भी है। आप चाहो तो अब श्मशान लोन भी मिल जाएगा!”
रमापति जी को चक्कर आ गया। बोले—”हमारे ज़माने में शादी में लोग सोना उधार लेते थे, अब के बच्चे खुद को उधार में फंसाते हैं!”
युवराज हँसते हुए बोला—”दादा, अगर EMI नहीं ली तो लाइफ कैसे जीएंगे? देखो ना, मेरे जूते, घड़ी, जैकेट, सब लोन पर लिए हैं!”
रमापति जी बोले—”बेटा, जब ये सब फटेगा, तब भी तू किस्त देगा क्या?”
बात-बात में दोनों की बहस चाय से ठंडी होकर फिर गरम हो जाती। रमापति जी को समझ नहीं आता कि ये नया ज़माना ज़्यादा मॉडर्न है या ज़्यादा उधारदार!
अब युवराज की नज़रों में तो फाइनेंस वाला दोस्त ही असली मसीहा था। कोई नई चीज़ खरीदनी हो, बस WhatsApp करना होता—”भाई, तू HDFC में है ना? एक लोन पास करवा दे!”
और रमापति जी? वो अब भी हर महीने ब्याज जोड़ते हैं, FD के काग़ज़ पलटते हैं और सोचते हैं—”हमने तो ज़िंदगी के 40 साल बिना किसी कर्ज़ के काट दिए। अब ये लोग 40 दिन भी बिना EMI के नहीं जी सकते!”
एक दिन युवराज एक दमकती हुई बाइक पर सवार होकर घर आया। हेलमेट उतारते ही बोला—”दादा! देखो 350cc! पापा से नहीं लिया, खुद ही फाइनेंस कराया है!”
रमापति जी की आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं—”मतलब तूने बाइक से पहले कर्ज़ लिया बेटा?”
युवराज मुस्कुराया—”अरे दादा, ये जमाना तेज़ है! जो आज नहीं लिया, वो लाइफ भर पछताएगा!”
रमापति जी ने सिर पकड़ लिया। बोले—”हमने तो ज़िंदगी भर सूती कुर्ता पहनकर बुलेट को सपना समझा था, और ये लड़का ब्याज पर बुलेट लेकर आया है!”
समय बीता। अब युवराज खुद 60 का हो चुका था। आँखों पर मोटा चश्मा, बालों में हल्की सफ़ेदी, और रिटायरमेंट प्लान की फ़ाइलें लिए बैंक-बैंक घूम रहा था।
उसी दिन उसका 22 साल का बेटा विराट बोला—”डैड, Goa जाना है दोस्तों के साथ। EMI पर लैपटॉप भी लेना है, और क्रेडिट कार्ड का लिमिट थोड़ा बढ़वाना है!”
युवराज ने अख़बार नीचे रखा, एक गहरी सांस ली और मुस्कुराकर बोला—”बिलकुल जा बेटा। और जाते-जाते मेरे लिए भी एक EMI वाला वॉकर ले आना!”
अब रमापति जी की पुरानी बातें युवराज के मन में गूंज रही थीं—”बेटा, लोन की गाड़ी में मज़ा तो है, पर जब पेट्रोल खत्म हो जाए तो किस्तें ठुकती हैं!”
और इसी एहसास के साथ युवराज बालकनी में बैठकर अख़बार पढ़ रहा था, जैसे कभी रमापति जी पढ़ते थे। सामने उसका बेटा मॉल से शॉपिंग बैग्स लेकर आ रहा था, क्रेडिट कार्ड झुलाते हुए।
रमापति जी अब नहीं थे, पर उनकी कही बातें हवा में तैर रही थीं। वक्त बदला है, सोच नहीं। हर पीढ़ी को अगली पीढ़ी की आदतें बेहिसाब लगती हैं, लेकिन एक दिन सबको अपने बचपन और जवानी की गलतियाँ खुद आईने में दिख ही जाती हैं।
तो जनाब, कहानी का सार यही है—
जो आज EMI में जी रहे हैं, कल वही अपने पोतों से कहेंगे—”हमारे ज़माने में…”
ज़िंदगी चलती रहेगी—कभी उधार में, कभी विचार में!
(काल्पनिक रचना)