प्रस्तुति : शिखा तैलंग, भोपाल
गुड़गांव की एक चमचमाती सोसाइटी में एक और भी चमचमाता परिवार रहता था—अग्रवाल परिवार। बाहर से देखने पर जैसे बाकी अमीरों की तरह ही साधारण लगता था, लेकिन अंदर से उनका घर किसी स्पेसशिप से कम नहीं था। घर में दरवाज़ा खोलने से पहले एलेक्सा पूछती थी—”आप कौन?” और अंदर घुसते ही रोबोटिक वैक्यूम इतनी स्पीड से आता था मानो आप उसके इलाके में अनधिकृत घुसपैठ कर रहे हों।
दीवारें दीवार नहीं, LED स्क्रीन थीं और फ्रिज भी स्मार्ट था—इतना स्मार्ट कि कभी-कभी खुद ही राशन ऑर्डर कर देता था। इस तकनीकी सर्कस के रिंगमास्टर थे राकेश अग्रवाल—एक साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट जिनका मानना था कि इंसान तो धोखा दे सकता है, लेकिन कोड नहीं। उन्हें अपने gadgets से उतना ही प्यार था जितना एक माँ को अपनी नई रेसिपी से।
लेकिन जितना वो मशीनों पर भरोसा करते थे, उतना ही कम भरोसा था उन्हें अपने सोलह साल के बेटे आरव पर—जो मोबाइल के साथ पैदा हुआ था, वीडियो गेम्स के बीच बड़ा हुआ और ‘पढ़ाई’ शब्द सुनते ही ऐंठ जाता था। राकेश ने फैसला किया कि अगर बेटे को बिगड़ने से रोकना है, तो उसे आधुनिक यंत्रों के सहारे ही साधा जा सकता है।
उन्होंने आरव के कमरे में एक स्मार्ट कैमरा लगवाया जो केवल आवाज़ सुनकर एक्टिव हो जाता था। मोबाइल और लैपटॉप में पैरेन्टल कंट्रोल ऐप डाल दिए, और GPS ट्रैकर तो ऐसा कि आरव टॉयलेट जाए तो भी मैप अपडेट हो जाए। आरव को शक तो था कि पापा कुछ जासूसी जैसा कर रहे हैं, लेकिन जैसे ही रात को उसने गेम खेलने के लिए मोबाइल का टाइम लॉक तोड़ा, तभी डैडी का फोन आ गया—”आरव, सोने का समय हो गया बेटा, नहीं तो कल स्कूल में गाल पे उबासी और टीचर के चॉक के बीच झगड़ा हो जाएगा।”
आरव एक पल को डर गया, फिर सोचा—ये आदमी है या एलेक्सा का बड़ा भाई? अपने दोस्त कबीर से जाकर बोला, “यार मेरे पापा तो जेम्स बॉन्ड बन गए हैं। कैमरा, ट्रैकर, रिकॉर्डर—घर में सांस भी लो तो लगता है रिपोर्ट बन रही है।”
कबीर ने हँसते हुए कहा, “भाई तू भी तो थोड़ा हैकिंग टाइप है, तू भी कुछ कर न।” और वहीं आरव के दिमाग की बत्ती जल गई। लेकिन उसने सोचा कि जवाब तकनीक से नहीं, आत्म-नियंत्रण से देगा। वो करेगा ऐसा सुधार कि पापा खुद दंग रह जाएंगे और मशीनें शरमा जाएंगी। आरव ने अपने दिनचर्या को चमत्कारी रूप से बदल डाला।
सुबह छह बजे उठना शुरू कर दिया, स्कूल की तैयारी समय पर करने लगा, मोबाइल बस एक घंटे के लिए इस्तेमाल करता, पढ़ाई में ध्यान देने लगा (मतलब अब कॉपी खोलकर पेन घुमाने लगा), और तो और—मम्मी की थोड़ी-बहुत मदद भी करने लगा, जैसे रोटी गोल बनाने का प्रयास (जो अकसर गोल कम और अफ्रीका के नक्शे जैसी होती)।
राकेश को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये बदलाव उनके पैरेन्टल ऐप्स का असर है या कोई गुप्त शक्तियों का चमत्कार।
क्रमश:
One Comment
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James bond toh aa gye ab spy kids bhi aenge qa?