लेखक : वी. कुमार (भोपाल)
हास्य और व्यंग्य में लिपटा शब्दों का अनोखा खेल!
सारांश :यह व्यंग्यात्मक कविता संग्रह समाज की विडंबनाओं, शब्दों के खेल, और हास्यपूर्ण सत्य को उजागर करता है।
चाहे तपस्या में वधु मांगना हो, कंजूसी से मैथ्स में पहुँचना हो या ‘ग्रह’ और ‘गृह’ की राजनीति—हर कविता में चतुराई से व्यंग्य छिपा है।’मध्यम मार्ग’ का पालन जीवन में जरूरी है, लेकिन सड़क पर नियमों का पालन और भी ज़रूरी है।
आइए इन व्यंग्यात्मक कविताओं का आनंद लीजिए –
वर
एक नवयुवक कर रहा था घोर तपस्या
उसकी थी अपनी समस्या
तपस्या से प्रसन्न होकर
देवता प्रकट हुए,
उन्होंने कहा-
“हे वत्स! मैं प्रसन्न हूं
कोई वर मांग लो!”
इस पर युवक बोला –
“हे प्रभु! यदि आप प्रसन्न हैं तो
मेरी समस्या सुलझा दो
वर तो मैं स्वयं हूं
मुझे कोई वधु दिला दो!”
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सोना
अमीर होने पर भी उनका
यही रोना है-
रात में भी सोचते हैं कि
कहां सोना है, कहां-कहां सोना है!
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जोड़
कंजूस ने अपने बेटे से हरदम
यों कहा –
“जोड़ते रहो, जोड़ते रहो!”
तो आपने क्या समझा
वह भी कंजूस हो गया?
जी नहीं,
वह तो बड़ा होकर
एक मैथमेटीशियन हो गया!
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ग्रह
पत्नी पीड़ित नेताजी
भाषण में सदैव यह कहते रहे –
“हे प्रभु! मेरे गृह में सदा शांति रहे!”
किंतु उनके चमचे यों इस बयान को
छपवाते रहे –
देखिए हमारे नेता कितने शांति प्रेमी हैं
सदैव यही कहते रहते हैं –
हे प्रभु! मेरे ग्रह में सदा शांति रहे!
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मध्यम मार्ग
जीवन के हर क्षेत्र में
मध्यम मार्ग ही अपनाना!
किंतु सड़क पर चलते वक्त
बायीं तरफ से ही जाना!