लेखिका: शबनम मेहरोत्रा (कानपुर)
गंगा मैया के आँचल में बसी आस्था की दिव्य यात्रा!
सारांश :
2013 में प्रयागराज कुंभ मेले का यह अनुभव जीवनभर की याद बन गया। त्रिवेणी संगम में डुबकी, पवित्र गंगा आरती, मंत्रोच्चार, विदेशी पर्यटकों की जिज्ञासा और दीपदान ने आत्मा को शांति दी। यह यात्रा आध्यात्म, संस्कृति, आस्था और खगोलीय योग का जीवंत साक्षात्कार थी।
आइए त्रिवेणी संगम की डुबकी, गंगा आरती, दीपदान, और भारतीय संस्कृति की भव्यता पर आधारित इस लेख को पढ़िए –
बात 2013 कुंभ मेले की है । मैं, बेटी और ड्राइवर के साथ प्रयागराज गये । कुंभ मेला देखने का यह मेरा पहला अनुभव था । मेरे परिवार में मेरी दादी जी ने यहाँ डुबकी 60 वर्ष पूर्व लगाई थी । सब मुझे बार बार भीड़ -भाड़ से बचने की सलाह दे रहे थे पर मैंने तो वीवीआईपी टेन्ट में बुकिंग करवा ली थी सो समझा रही थी कि चिंता न करो भीड़ कि दूसरी तरफ़ टेंट में रूकूँगी अब समय बदल गया है । हमने नाव की बुकिंग पहले ही कर ली थी । हम तीनों नाव से त्रिवेणी डुबकी लगाने साढ़े चार बजे तड़के हम गंगा तट पहुँच गए।
बड़ा ही मनोरम दृश्य था सूर्योदय की सुनहरी सी लालिमा , पंछियों की चहचहाहट , मंदिर की बजती घंटी और डूबकी लगाते साधु-सन्तों का मंत्रोचार साफ़ सुनाई दे रहा था । पहली बार हुए इस अद्भुत अनुभव से हम भाव विभोर हो रहे थे ।
गंगा -यमुना- सरस्वती के संगम जाकर देखा जन सैलाब सा आया हुआ है हमने त्रिवेणी में डुबकी लगाई।
वहाँ पंडित जी ने हम मॉं बेटी को विधिवत पूजा और आरती करवाई ।सभी के लिए प्रसाद लेकर, कुछ देर हम गंगा किनारे मनोहर दृश्य का दर्शन करते रहे साक्षात देवदर्शन हो रहे थे ,विविधता में एकता दिखाई दे रही थी । फिर नाव से वापस आये कुछ दूर कच्चे उबड- खाबड़ रास्ते चलकर सड़क तक पहुँचे सड़क के दूसरी तरफ़ हमारे टेंट थे जहाँ भोजन सभी का इंतज़ार कर रहा
था । ड्राइवर बोला जल्दी आइये 3 बजे टेबुल हट जायेगी और स्टाफ़ का खाना लगेगा ।
खाना खा रहे तो देखा कुछ विदेशी पर्यटक भी कुंभ मेला देखने आये हुए थे और बेटी से इस मेले का महत्व समझ रहे थे कि नदियों का संरक्षण व साफ़ रखना भी ज़रूरी है । दो घंटे आराम कर हम नाव से घाट पर चल पड़े जहाँ संध्या आरती करने व दीप दान करना था बहुत बड़ा घाट कितनी चौड़ी सीढ़ियाँ भीड़ होने के बावजूद सभी आराम से पूजास्थल पर पूजा कर रहे थे , पूछने पर पंडित जी ने बताया सभी पंडितों की अपनी अपनी जगह निश्चित होती है । वाह क्या मनमोहक नजारा था गंगा मइया दीपमालिका से सजी नव दुल्हन कि तरह लग रहीं थीं । पूजा के पश्चात हम मॉं बेटी ने गंगा मैया को अपनी मनोकामना आस्था सहित दीप प्रवाहित कर जल माथे से लगाकर बहुत सुकून मिला कुछ देर वहीं बैठ नयन सुख लिया तत्पश्चात् वापस टैंट की ओर प्रस्थान किया।
कुंभ मेले का सामाजिक सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व समझ गई थी यह उत्तम कोटि का खगोलीय योग है । ग्रह नक्षत्रों के विशिष्ट योग से प्रादुर्भाव होता है ।
पतित पावनी गंगा मैया कितनी महत्वपूर्ण हैं सच जल ही जीवन है ।
जीवन का सुखद संस्मरण है ।
(समाप्त )