लेखक: उत्तम कुमार तिवारी “उत्तम “ (लखनऊ)
नारी – शक्ति का मूल, अबला नहीं, अद्वितीय है!
सारांश :
यह लेख इस भ्रांति को दूर करता है कि स्त्री ‘अबला’ है। वेद, पुराण और मनुस्मृति बताते हैं कि नारी सृष्टि की मूल शक्ति, ज्ञान और समृद्धि की प्रतीक है। शिव से लेकर त्रिदेव तक, सभी को पूर्णता स्त्री शक्ति से ही मिलती है।
आइए ‘अबला’ की धारणा को गलत साबित करने वाले इस लेख हो पढ़िए –
मेरा आज का विषय है कि हम अक्सर स्त्री को अबला कहते है क्या यह उचित है | लेख लम्बा जरूर हैं किंन्तु विचार करने योग्य हैं | आप सभी पाठको से मेरा निवेदन हैं कि थोडा समय निकाल कर अवश्य पढे ताकि इस पर विचार किया जा सके |
मनुस्मृति मे नारी को सबसे उच्च पद पर रखा गया है और कहा गया है कि ” यत्र नारियस्तु पूजयन्ते रमन्ते त्रत देवता ‘ हैं | यानी जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का निवास होता है| अब हम आदि से काल से अब तक इस पर कुछ प्रकाश ड़ालने की कोशिस कर रहे हैं |
सब से पहले हम वर्ण माला की मात्रा से ही शुरू करते हैं जो माँ शारदा के मुख से निकली हैं वो मात्रा हैं ई , इ हैं अब देखिये शिव शब्द मे मात्रा इ की है और इस मात्रा का लिंग बोध स्त्री हैं यदि हम शिव से ये मात्रा हटा दे तो शिव शव हो जाता हैं तो सृष्टि का उद्भव नही हो सकता है | और जब शिव मे इ की मात्रा होती तो शिव पूर्ण होता हैं | पुरुष मे शक्ति का संचार स्त्री के द्वारा ही संभव है | बिना स्त्री के पुरुष शू न्य हैं | त्रिदेव भी शक्ति की ही आराधना करते थे | माँ लक्ष्मी , माँ सरस्वती , माँ शक्ति ( दुर्गा ) की | जितने भी देवताओ ने दनुजो से युद्ध जीते हैं वो सब शक्ति के बल पर ही जीते हैं शक्ति स्त्री है |
हमारे प्राचीन ग्रंथो की रचना भी स्त्री के ही आशीर्वाद से संभव हो सकी वो थी माँ सरस्वती | देव लोक का वैभव भी स्त्री के द्वारा ही हैं वो हैं माँ लक्ष्मी | हमारे वेदो की रचना मे भी स्त्री की सहभगिता रही वो हैं :- अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं – अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपमुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि |
वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय| वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख – समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा- जो सबको जगाती है इत्यादि अनेक आदर सूचक नाम दिए गए हैं|
पुराणों में नारी को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सहायिका माना गया है ।
जिसको हम अबला कहते हैं उसी के वियोग मे श्री शिव जी तांडव करने लग गये थे क्योंकि वो शक्ति विहीन हो गये थे | जब मनु सतरूपा ने तपस्या की ” चाहहू तुमही समान सुत प्रभु सन कौन दुराऊ” तो भगवान ने आशीर्वाद दिया| भगवान को झुकना पडा और भगवान को वही करना पडा| ये स्त्री है |
(क्रमशः )
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