लेखिका: शिखा तैलंग (भोपाल )
सारांश :
बीमार दक्षा की उपेक्षा देखकर उनकी पोती श्रेया और बच्चों ने एक नाटक रचा, जिसमें उन्होंने दिखाया कि बुज़ुर्गों की उपेक्षा भविष्य में कैसे लौटकर आती है। इस इमोशनल ड्रामा को देखकर अजीत और संध्या की आंखें खुल गईं और उन्होंने मां से माफी मांगते हुए सम्मान देने का वादा किया। बच्चों की मासूम कोशिश से परिवार में सम्मान, संवेदना और प्यार की वापसी हुई — यही सच्ची संस्कार शिक्षा है।
आइये विस्तार से पड़ते है बुजुर्गों के सम्मान पर आधारित यह इमोशनल कहानी –
चैप्टर—2
यह सुनकर वृद्धा मां बोली – ‘ठीक है, बेटा। कल से मैं अपनी ड्यूटी संभाल लूंगी, तुम तो अपनी ड्यूटी संभाले रहना।’ यह कहने के सिवा उसके पास कोई चारा ही नहीं बचा था।
यह बातचीत अजीत—संध्या की बेटी श्रेया ने सुन ली। श्रेया की उम्र केवल नौ साल है। उसे यह सुनकर बहुत दुख हुआ कि दादी की तबीयत अभी पूरी तरह सुधर ही नहीं पाई है कि उसके पापा ने उन्हें अपनी ड्यूटी संभालने को कह दिया है।
बच्चे का मन कोमल होता है। उस पर जरा सी घटना से बहुत बड़ी खरोंच पड़ जाती है। यही श्रेया के साथ भी हुआ। उसने आहत मन से अपने अड़ोस—पड़ोस के साथियों — गोलू, बिट्टू और तृप्ति से चर्चा की।
श्रेया की बातें सुनकर बच्चे सोच में पड़ गए। वे इस बात पर विचार करने लगे कि कैसे श्रेया के मम्मी—पापा को समझाया जाए कि बूढ़ी और बीमार मां को दवाइयों से ज्यादा दुआओं और सम्मान की जरूरत होती है। वे दो—तीन दिन तक इसी उधेड़बुन में पड़े रहे।
आखिरकार बिट्टू के दिमाग में एक आइडिया क्लिक हुआ। उसने श्रेया के साथ बाकी बच्चों को अपने प्लान के बारे में बताया। यह प्लान सुनकर बच्चे उछल पड़े। फिर उसे अंजाम देने के लिए सही वक्त का इंतजार करने लगे।
और वह मौका संडे के रूप में सामने आ गया। उस दिन संध्या और अजीत दोनों का मूड अच्छा था। श्रेया उनके पास जाकर बोली — पापा—मम्मी हमने एक छोटा सा प्ले तैयार किया है। आप लोग एकाध घंटे बाद छत पर आ जाना। मैं अपने फ्रेंड्स के साथ वहीं उस प्ले को करूंगी।
यह सुनकर अजीत और संध्या बोले — ये तो बहुत अच्छी बात है, बेटा! हम जरूर तुम्हारा प्ले देखने आएंगे।
माता—पिता की रजामंदी मिलते ही श्रेया ने फौरन अपने दोस्तों को इत्तिला कर दी। वे सब छत पर पहुंच गए और नाटक की तैयारियों में व्यस्त हो गए। जब नाटक की तैयारियां पूरी हो गईं तो श्रेया ने अपने मम्मी—पापा और दादी को भी छत पर बुला लिया। फिर बच्चों के नाटक का मंचन शुरू हुआ।
चादर से बने पर्दे के उठते ही नाटक शुरू हुआ। अजीत, संध्या और दक्षा ने देखा कि मंच पर बिट्टू बिलकुल वयोवृद्ध आदमी जैसा रूप धारण करके और तृप्ति एक बुढ़िया के वेश में जमीन पर चद्दर ओढ़कर केवल अपने—अपने मुंह बाहर निकालकर पड़े हुए हैं। वे दोनों कराह रहे हैं।
फिर वहां श्रेया आती है और वह बोलना शुरू करती है — ये नाटक है बीस साल बाद का! ये जो दो मरीज यहां पड़े दिख रहे हैं वे मेरे मम्मी—पापा हैं। बेचारे! पहले जवान थे अब बूढ़े हो गए हैं। लाठी का सहारा लेकर ही चल—फिर पाते हैं। इनके घुटनों में दर्द रहता है। ये लोग पिछले दस दिनों से मलेरिया से ग्रस्त हैं। मैंने इन्हें मलेरिया की गोलियां लाकर दे दी हैं। मुझे इनकी देखभाल का समय ही नहीं मिल पा रहा है। मैं तो बस दवाई खिलाकर इन्हें इनके कमरे में बंद करके अपने आफिस चली जाती हूं। क्या करूं उनकी देखभाल की मुझे फुर्सत ही नहीं है!
इसके बाद पापा—मम्मी बने बिट्टू और तृप्ति श्रेया को करुण आवाज में पुकारने लगते हैं — बेटा! हमारे पास रुक जाओ! बेटा! हमें पानी दे जाओ!
लेकिन श्रेया उनकी आवाज को अनसुना कर देती है और अपना बैग टांग कर स्कूटी स्टार्ट करने की एक्टिंग करती है। फिर टाटा—बाय—बाय करके मंच से बाहर चली जाती है।
यह सीन देखकर अजीत और संध्या की स्थिति ऐसी हो गई मानो काटो तो खून ही नहीं निकले। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उनके चेहरे पर एक के बाद एक कई तरह की भावनाएं उमड़ पड़ीं।
क्रमश:
(काल्पनिक कहानी )
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