लेखिका: शिखा तैलंग (भोपाल )
सारांश :
बीमार दक्षा की उपेक्षा देखकर उनकी पोती श्रेया और बच्चों ने एक नाटक रचा, जिसमें उन्होंने दिखाया कि बुज़ुर्गों की उपेक्षा भविष्य में कैसे लौटकर आती है। इस इमोशनल ड्रामा को देखकर अजीत और संध्या की आंखें खुल गईं और उन्होंने मां से माफी मांगते हुए सम्मान देने का वादा किया। बच्चों की मासूम कोशिश से परिवार में सम्मान, संवेदना और प्यार की वापसी हुई — यही सच्ची संस्कार शिक्षा है।
आइये विस्तार से पड़ते है बुजुर्गों के सम्मान पर आधारित यह इमोशनल कहानी –
चैप्टर—1
अजीत उसगांवकर की वृद्धा मां दक्षा कई दिनों से बिस्तर पर थी। उन्हें मलेरिया जो हुआ था। बुखार बार—बार चढ़ता—उतरता, फिर उल्टी—दस्त की परेशानी थी सो अलग। अजीत ने पैसे बचाने की गरज से अपनी मां को किसी अस्पताल ले जाने की जहमत नहीं उठाई और बस पास के क्लिनिक से डा गणपति चंचलानी को लक्षण बताकर दवा ले आता। करीब 15 दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा।
अपनी वृ़द्धा सास को बिस्तर पर पड़े-पड़े देखकर बहू संध्या परेशान हो गई। उसने सास को एक कमरे मे बंद कर दिया। पहले तो आई सुबह उठकर झाड़ू-पोंछा लगा देती थी, भले ही उनके घुटनों में दर्द हो रहा हो। अब यह जिम्मेदारी बहू के गले जो पड़ गई थी। अत: वह मन ही मन अपनी सास से कुढ़ती रहती।
संध्या के पास हर रोज कामों की बहुत बड़ी लिस्ट रहती। जैसे ही सुबह होती और वह किचन में जाने को होती तब वह अजीत के सामने उस लिस्ट का वाचन करती। वह उसे इतना जोर से पढ़ती कि भले ही सास खांस रही हो पर लिस्ट के कामों के बारे में उसे सुनाई पड़ जाए।
उसकी लिस्ट में खाना बनाने, अजीत का टिफिन लगाने, बच्चों को तैयार करने, पूरे घर में झाड़ृ—पोंछा करने और बरतन धोने के अलावा आज किस किटी पार्टी या बर्थडे पार्टी में जाना है, टीवी पर कौन—कौन से षड्यंत्रों से भरे फैमिली सीरियल्स देखने हैं, कौन सी रहस्य और उत्तेजना से भरपूर बेव सीरीज आदि देखना है, इसका भी जिक्र रहता था।
सास को बिस्तर पर आराम फर्माते देख उसे बड़ी कोफ्त होती। वह बड़-बड़ करती, ‘ पता नहीं कब जान छूटेगी। बस, पड़े-पड़े बिस्तर तोड़ने के अलावा कोई काम नहीं है। फिर दवाइयों, चाय-नाश्ते, खाने-पीने का खयाल रखो वो अलग।’
अजीत तो बस सुबह उठकर अखबार पढ़ता, चाय-नाश्ता करता, नहाता-धोता और टिफिन लेकर ऑफिस चला जाता। बहू दिनभर सास को कोसती हुई अपने काम-धाम में बेमन से लगी रहती और ये सब काम पूरे होने के बाद अपने पसंदीदा टीवी सीरियल्स व बेव सीरीज देखने के लिए टीवी से चिपकी रहती।
जब ऐसे हालात में समय चक्र घूमता हुआ 15वें दिन पर पहुंचा तो दक्षा की हालत कुछ ठीक दिखने लगी। अजीत के मन में पता नहीं उस दिन क्या बात आई। वह दक्षा से मिलने से उनके कमरे में पहुंच गया। उसने बचाव के तौर पर अपने मुंह पर रूमाल रखा हुआ था मानो मलेरिया कोई इन्फेक्शन वाली बीमारी हो, कहीं उसे न हो जाए।
उसे अपने पास देखकर मां की आंखों में चमक आ गई। बेटे ने भी बड़े प्यार से पूछा – ‘और आई तबीयत कैसी है?’
आई थोड़ा सा कराहती हुई बोली – ‘ठीक है बेटा।’
यह सुनकर अजीत बहुत खुश हुआ। वह बोला – ‘चलो आई , अच्छा हो गया। अब संध्या का समय थोड़ा बच जाएगा और उसे कल से झाडू-पोंछा नहीं लगाना होगा। बरतन नहीं मांजने पड़ेंगे। तो अम्मा कल से अपनी सुबह की ड्यूटी संभाल लेना। मुझे तो ऑफिस में इतना काम रहता है कि शाम होते-होते निचुड़ जाता हूं। फिर रास्ते में वाहनों की रेलमपेल रहने के कारण दो व्हीलर चलाकर आने में हालत खराब हो जाती है।’
यह सुनकर वृद्धा मां बोली – ‘ठीक है, बेटा। कल से मैं अपनी ड्यूटी संभाल लूंगी, तुम तो अपनी ड्यूटी संभाले रहना।’
क्रमश:
(काल्पनिक कहानी )
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