लेखक : मनोज कुमार, गोण्डा (उत्तर प्रदेश)
जहां श्रद्धा है सच्ची, वहीं मन में बसे हैं मेरे राम।
सारांश :
यह कविता हमें भीतर झांककर राम को अनुभव करने की प्रेरणा देती है, क्योंकि प्रभु हृदय में बसे होते हैं – केवल श्रद्धा, प्रेम और त्याग से उन्हें पाया जा सकता है। शबरी जैसी निष्कलंक भक्ति और आशा-विश्वास की भावना को दर्शाते हुए यह कविता बताती है कि सत्य और उजाला भीतर ही होता है। राम को केवल बाहरी पूजा से नहीं, बल्कि कर्म, प्रेम, आस्था और आत्मिक शुद्धता से पाया जा सकता है।
आइए प्रभु श्रीराम की आंतरिक अनुभूति, श्रद्धा, विश्वास और आत्म-शुद्धि का सुंदर संदेश देने वाली कविता का आनंद लीजिए –
मन के किवाड़ खोलो
मन के किवाड़ खोलो
देखो मेरे राम को
बैठे हैं ये हृदय में
लेके कई नाम को
सच्ची आशा, लेकर देखो
मिलेंगे वही कुछ खोकर देखो
झांको अन्दर, प्रीत लगाकर
देखो उसे जो निर्धन है सब देकर
अंधेरा वही है, उजाला वही है
जो देता है हर काम को
मन के किवाड़ खोलो
देखो मेरे राम को
बैठे हैं ये हृदय में
लेके कई नाम को
उसे श्रद्धा रखो जीवन में
टाल ही देंगे, दुख जीवन से
वही सत्य है, छू लो उसको
अनमोल है वो पा लो उसको
आश वही है, विश्वास वही है
जो दिया है हरिनाम को
मन के किवाड़ खोलो
देखो मेरे राम को
बैठे हैं ये हृदय में
लेके कई नाम को
मिटती नही है भाग्य की रेखा
जिसने भी मेरे राम को देखा
शबरी ने जो प्रेम पथ पे बिछाया
आए प्रभु तो ह्रदय भर आया
कर्म वही है, अकर्म वही है
वंदन करो सुबह शाम को …
मन के किवाड़ खोलो
देखो मेरे राम को
बैठे हैं ये हृदय में
लेके कई नाम को