“डिजिटल दौर में सरल सा काम भी बन गया इतना जटिल!”
(AI GENERATED CREATION)
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
सुविधा की भी एक सीमा होती है
कुछ देर बाद मेरा कस्टमाइज्ड समोसा आया।
वह सचमुच सुंदर था।
सुनहरा।
कुरकुरा।
मटर सही संख्या में।
मूँगफली निर्धारित मात्रा में।
हींग बिल्कुल मिलीग्राम वाली।
मैंने पहला निवाला लिया।
स्वाद शानदार था।
मैंने दुकानदार की ओर देखा और कहा—
“कमाल है! समोसा तो वाकई अच्छा है।”
वह मुस्कुराया।
“सर, फीडबैक फॉर्म भर दीजिए।”
मैं हँस पड़ा।
लेकिन तभी दुकानदार भी हँसने लगा।
उसने कहा—
“मजाक कर रहा हूँ सर।”
मैंने उसकी ओर देखा।
वह मोबाइल बंद कर रहा था।
“सच बताऊँ,” उसने कहा, “हमने सोचा था कि ग्राहक को ज्यादा विकल्प देंगे तो वह ज्यादा खुश होगा। फिर विकल्प बढ़ते गए… और फॉर्म बढ़ता गया। आखिर में हमें समझ आया कि सुविधा और उलझन के बीच बहुत पतली रेखा होती है।”
बुजुर्ग ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा—
“तकनीक का इस्तेमाल करो बेटा, लेकिन इतना नहीं कि ग्राहक को नाश्ते से पहले अपने अस्तित्व का प्रमाण देना पड़े।”
दुकानदार हँसा।
अगले दिन दुकान के बाहर नया बोर्ड लगा था—
“कस्टमाइज्ड ब्रेकफास्ट—यदि आप चाहें।”
और उसके नीचे—
“साधारण नाश्ता—बिना फॉर्म, बिना पासवर्ड, बिना प्रोफाइलिंग और बिना सोशल मीडिया प्रतिबद्धता के।”
उस दिन से दुकान पर दो कतारें लगने लगीं।
एक उन लोगों की, जिन्हें अपने समोसे में 37 ग्राम आलू और 14 मटर के दाने चाहिए थे।
दूसरी उन लोगों की, जो बस कहते थे—
“भाई, दो समोसे और एक चाय।”
और शायद यही सबसे अच्छी बात थी।
क्योंकि तकनीक का उद्देश्य इंसान को जटिल बनाना नहीं, उसका जीवन आसान बनाना है।
कस्टमाइजेशन अच्छी चीज है, सुविधा उससे भी अच्छी—लेकिन सबसे अच्छी चीज है इंसान की पसंद का सम्मान।
आखिर नाश्ता वही सबसे स्वादिष्ट होता है,
जिसमें समोसे के साथ थोड़ी-सी आज़ादी भी परोसी जाए।
(काल्पनिक रचना)
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