“डिजिटल दौर में सरल सा काम भी बन गया इतना जटिल!”
(AI GENERATED CREATION)
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
समोसा, सोशल मीडिया और बैंक बैलेंस
अब तेल का चुनाव था—
सरसों का तेल।
मूँगफली का तेल।
सोयाबीन।
राइस ब्रान।
ऑलिव ऑयल।
या—
“शेफ की व्यक्तिगत पसंद।”
मैंने पूछा, “ऑलिव ऑयल में समोसा?”
शेफ ने कहा, “सर, आजकल ग्राहक स्वास्थ्य के प्रति बहुत जागरूक हैं।”
“तो समोसा क्यों?”
शेफ कुछ क्षण चुप रहा।
“सर, यह सवाल हमारे सिस्टम में नहीं है।”
मैंने अगला विकल्प चुना।
“समोसा कितना कुरकुरा चाहिए?”
हल्का।
मध्यम।
कुरकुरा।
अत्यधिक कुरकुरा।
या—
“इतना कुरकुरा कि पड़ोसी भी सुन लें।”
मैंने आखिरी वाला चुन लिया।
अब मुझे लगा कि ऑर्डर पूरा हो गया।
लेकिन डिजिटल दुनिया इतनी आसानी से किसी को भूखा नहीं छोड़ती।
अगला सवाल था—
“आप समोसा किस उद्देश्य से खा रहे हैं?”
भूख।
स्वाद।
तनाव।
प्रेम-विरह।
ऑफिस की झुंझलाहट।
रिश्तेदारों से नाराज़गी।
सोशल मीडिया कंटेंट।
या—
“बस सामने देखा और मन कर गया।”
मैंने आखिरी विकल्प चुना।
तभी अगला सवाल आया—
“क्या आप अपने भोजन की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करेंगे?”
हाँ।
नहीं।
शायद।
“यदि भोजन अच्छा लगा तो।”
मैंने वही चुना।
फिर पूछा गया—
“क्या आप हमारी दुकान को टैग करेंगे?”
हाँ।
“क्या आप रील बनाएँगे?”
हाँ।
“क्या आप पाँच मित्रों को टैग करेंगे?”
हाँ।
“क्या आप हमारे समोसे पर सकारात्मक टिप्पणी लिखेंगे?”
मैंने लिखा—
“पहले समोसा तो खिला दो।”
सिस्टम ने मेरी टिप्पणी स्वीकार नहीं की।
अंततः वह प्रश्न आया जिसने मेरी भूख को आध्यात्मिक अनुभव में बदल दिया—
“आपके बटुए में इस समय कितनी नकदी उपलब्ध है?”
मैंने सोचा, यह जानकारी समोसे के किस अंग में प्रयुक्त होगी?
इसके नीचे था—
“बैंक बैलेंस?”
मैंने दुकानदार से पूछा, “भाई, यह बताना जरूरी है?”
“जी सर। इससे हमें आपकी भुगतान क्षमता समझने में सहायता मिलती है।”
मैंने कहा, “लेकिन मैं समोसे खरीद रहा हूँ, बैंक लोन नहीं।”
वह बोला, “सर, यह हमारी कस्टमर इंटेलिजेंस पॉलिसी है।”
अब मेरे भीतर का ग्राहक जाग चुका था।
मैंने पूछा—
“अगर मेरे पास पैसे कम हों तो?”
“तो हम आपको बजट फ्रेंडली समोसा सुझाएँगे।”
“और अगर पैसे बहुत हों?”
“तो प्रीमियम समोसा।”
“उसमें क्या होगा?”
“सर, वही समोसा।”
“फिर कीमत ज्यादा क्यों?”
“प्लेट प्रीमियम होगी।”
मैंने मोबाइल की स्क्रीन देखी। फॉर्म अभी भी खत्म नहीं हुआ था।
अंतिम घोषणा सामने थी—
“मैं प्रमाणित करता हूँ कि मेरे द्वारा दी गई सभी जानकारी सत्य है और मैं अपनी पसंद के अनुसार तैयार किए गए भोजन की समस्त जिम्मेदारी स्वयं वहन करूँगा।”
मैंने ‘Agree’ दबाया।
स्क्रीन पर संदेश आया—
“बधाई हो! आपका ऑर्डर सफलतापूर्वक स्वीकार कर लिया गया है।”
नीचे लिखा था—
“अनुमानित प्रतीक्षा समय—27 मिनट।”
मैं चौंका।
“सिर्फ दो समोसे?”
काउंटर वाला मुस्कुराया—
“जी सर। कस्टमाइज्ड हैं।”
मैंने पूछा, “साधारण समोसा कितने समय में मिलता है?”
“सर, पाँच मिनट।”
“तो दो साधारण समोसे दे दो।”
वह बोला—
“उसके लिए भी एक छोटा-सा फॉर्म है।”
मैंने सिर पकड़ लिया।
तभी बगल में बैठे एक बुजुर्ग ठहाका मारकर हँसे।
उन्होंने कहा—
“बेटा, तुम्हें समोसा नहीं चाहिए। तुम्हें धैर्य चाहिए।”
मैंने पूछा, “आपने फॉर्म भरा?”
उन्होंने कहा—
“नहीं।”
“फिर आपका नाश्ता?”
उन्होंने सामने रखी प्लेट दिखाई।
दो गरम समोसे और चाय।
मैंने पूछा, “कैसे?”
उन्होंने कहा—
“मैंने दुकानदार से कहा—भाई, दो समोसे देना।”
“बस?”
“बस।”
मैंने आश्चर्य से पूछा, “आपका डेटा?”
बुजुर्ग बोले—
“उसे मेरी भूख से क्या लेना-देना?”
मैं चुप हो गया।
(क्रमश:)
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