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दो हजार वर्ष पुरानी वह गाथा, जिसने दो संस्कृतियों को रिश्तों के अटूट सूत्र में बाँधा।
श्यामकांत देशपांडे, नागपुर
अयोध्या की राजकुमारी और कोरिया का राजसिंहासन
भारत और दक्षिण कोरिया के संबंध केवल आधुनिक कूटनीति, व्यापार और तकनीक तक सीमित नहीं हैं। इन संबंधों की जड़ें एक ऐसी प्राचीन कथा में भी दिखाई देती हैं, जो लगभग दो हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है। यह कथा है अयोध्या की राजकुमारी सूरीरत्ना और कोरिया के राजा किम सुरो के विवाह की। सरयू नदी के तट पर स्थित अयोध्या में बना रानी हेओ ह्वांग-ओक का स्मारक आज भी इस सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है।
इस विवाह की विशेषता यह है कि यह केवल दो व्यक्तियों के मिलन की कहानी नहीं है, बल्कि दो दूरस्थ भूभागों, राजपरिवारों और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच स्थापित संबंध का प्रतीक भी है। भारतीय समाज में विवाह परंपरागत रूप से परिवारों और समुदायों को जोड़ने वाला संस्कार रहा है। इसी दृष्टि से सूरीरत्ना और किम सुरो की कथा भारतीय पाठकों के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
इस कहानी का प्रमुख प्राचीन स्रोत कोरियाई ग्रंथ समगुक युसा है, जिसका संकलन तेरहवीं शताब्दी में बौद्ध भिक्षु इल्योन ने किया था। इसके ‘गारकगुकगी’ नामक खंड में गाया राज्य, राजा किम सुरो और दूर देश से आई राजकुमारी के विवाह का वर्णन मिलता है। कोरिया में राजकुमारी को हेओ ह्वांग-ओक के नाम से जाना जाता है। उनकी जन्मभूमि को ‘अयुता’ कहा गया है, जिसे भारत की अयोध्या से जोड़ने की परंपरा प्रचलित है। हालाँकि, अयुता की वास्तविक भौगोलिक पहचान को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद भी हैं।
प्रचलित कथा के अनुसार, अयुता में राजा पद्मसेन और रानी इंदुमती का शासन था। एक दिन राजा को स्वप्न में दिव्य संदेश मिला कि उनकी पुत्री सूरीरत्ना का विवाह सुदूर देश गाया के राजा किम सुरो से होना नियत है। बताया गया कि राजा किम सुरो को भी पहले से विश्वास था कि उनकी जीवनसंगिनी किसी दूर देश से आएगी।
राजकुमारी के लिए यह यात्रा आसान नहीं थी। उस समय आज की तरह हवाई जहाज, आधुनिक बंदरगाह और संचार के साधन उपलब्ध नहीं थे। समुद्र पार करके किसी अपरिचित देश तक पहुँचना साहस, धैर्य और संसाधनों की माँग करता था। फिर भी, कथा के अनुसार, राजपरिवार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और राजकुमारी को समुद्री यात्रा पर भेजने की तैयारी शुरू हुई।
इस यात्रा के साथ एक और उल्लेखनीय वस्तु का वर्णन मिलता है—पासा पत्थरों से बना एक छोटा स्तूप, जिसे समुद्र की यात्रा में शुभ और रक्षात्मक प्रतीक के रूप में देखा जाता है। कोरिया के गिमहे में रानी से संबंधित स्मारक के निकट इन पत्थरों की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
इस प्रकार, सूरीरत्ना की कथा का आरंभ ही एक ऐसे निर्णय से होता है, जिसमें राजपरिवार का विश्वास, अज्ञात भविष्य को स्वीकार करने का साहस और दो दूरस्थ संसारों को जोड़ने की आकांक्षा एक साथ दिखाई देती है। यही कारण है कि यह कथा आज भी भारत और कोरिया के सांस्कृतिक संबंधों में एक विशिष्ट स्थान रखती है।
(क्रमश:)
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