1857 के स्वतंत्रता संग्राम की महिला स्वतंत्रता सेनानी
श्यामकांत देशपांडे, नागपुर
…उस समय किसी प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी को शरण देना स्वयं मृत्यु को आमंत्रण देने के समान था। लेकिन बहादुर अजीजन बाई ने बिना घबराए दरवाजा बंद कर दिया। उन्होंने घायल और रक्त से लथपथ तात्या टोपे का सिर अपनी गोद में रखा और उपलब्ध दवाइयों तथा अपने दुपट्टे की सहायता से उनका उपचार किया।
यह क्षण अत्यंत भावुक था।
कुछ स्वस्थ होने के बाद जब अजीजन बाई ने तात्या टोपे से पूछा कि जब उन्होंने उनका सिर अपनी गोद में रखा था, तब उन्हें कैसा लगा, तो तात्या टोपे ने भावुक होकर कहा—
“मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने ही घर में हूँ और मेरा सिर मेरी माँ की गोद में है। मुझे इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि मैं किसी नर्तकी या गायिका के घर में हूँ। मेरे लिए उस समय केवल यह मायने रखता था कि मुझे एक माँ जैसी ममता और सुरक्षा मिली।”
कहा जाता है कि यही भावना उनके मन में अंत तक रही। उन्होंने यह भी कहा कि देश के लिए लड़ने वाले सभी लोग उनके भाई-बंधु हैं।
अजीजन बाई ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हर संभव तरीके से सेनानियों की सहायता की। तात्या टोपे की सहायता करने की इस घटना ने उनके जीवन को जैसे एक नई दिशा दे दी। उन्होंने महिलाओं की एक अलग टुकड़ी तैयार की, जिसे “मस्तानी फौज” के नाम से जाना गया।
उनकी महिला साथियों ने मिलकर तात्या टोपे और नाना साहब पेशवा के लिए धन एकत्र करने, अंग्रेजों की गतिविधियों की जासूसी करने और स्वतंत्रता सेनानियों तक महत्वपूर्ण सूचनाएँ पहुँचाने का कार्य किया। कई बार वे सैनिकों की वर्दी पहनकर घुड़सवारी करती थीं और अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान में सक्रिय रूप से भाग लेती थीं।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी तात्या टोपे का पूरा नाम रामचंद्र पांडुरंग टोपे था। उन्हें 7 April 1859 को गिरफ्तार किया गया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उनके विश्वस्त मित्र और नरवर के राजा मानसिंह ने उनके ठिकाने की जानकारी मेजर मीड को देकर उन्हें धोखे से गिरफ्तार करवाया। इसके बाद 18 April 1859 को शिवपुरी में तात्या टोपे को फाँसी दे दी गई। आज शिवपुरी में उनका स्मारक भी स्थित है। उनकी मृत्यु के बाद स्वतंत्रता संग्राम के इस चरण को एक बड़ा आघात पहुँचा।
अजीजन बाई के जीवन के अंतिम दिनों के संबंध में ऐतिहासिक स्रोत पूरी तरह एकमत नहीं हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, अंग्रेजी सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। उनसे अंग्रेजों से क्षमा माँगने अथवा उनके लिए काम करने को कहा गया, लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।
कहा जाता है कि सितंबर 1857 के अंत में जनरल हैवलॉक की सेना के सैनिकों ने उन्हें गोली मार दी। गोली चलाने वालों में भारतीय सैनिक भी शामिल थे। मृत्यु के समय भी अजीजन बाई के साहस में कोई कमी नहीं आई। उनके अंतिम शब्द बताए जाते हैं—
“डरते क्यों हो? चलाओ गोली!”
और वह हँसते हुए देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर गईं।
अजीजन बाई का जीवन इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल रणभूमि में तलवार उठाने वाले सैनिकों ने ही नहीं लड़ा था। समाज के उन वर्गों की महिलाओं ने भी इसमें अपना सर्वस्व समर्पित किया, जिन्हें इतिहास ने लंबे समय तक वह सम्मान नहीं दिया, जिसकी वे अधिकारी थीं।
अजीजन बाई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन साहसी महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने अपने कला-कौशल, धन, बुद्धिमत्ता, साहस और देशप्रेम—सब कुछ मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया।
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