“कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं, फिर भी पूरी ज़िंदगी का सहारा बन जाती हैं।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
तुझसे ही ज़िन्दगी का आगाज़ हुआ था…
तू ही.. अब मेरी साँसों का इख्तिताम है…..
“ एजाज, उठो बेटा !.. काम पर नहीं जाना है क्या ?”
अब्बा की तेज़ आवाज़ सुनकर उसने अपनी मुँदी-मुँदी आँखें खोल कर उन्हें देखा, वह ठंड से बचने के लिए टोपी और शॉल से मुँह, नाक सब छुपाए चाय लेकर खड़े उसे उठाने की कोशिश कर रहे थे । उनकी तैयारी देखकर एजाज समझ गया कि, वह काम पर जाने के लिए पूरी तरह तैयार खड़े हैं ।
“ क्या…अब्बा.. क्यों उठा दिया मुझे ? इतने प्यारे ख़्वाब देख रहा था मैं ।”
वह मुँह फुलाता हुआ वापस कंबल सिर तक तानकर लेटने लगा, तभी उसके अब्बा ने कंबल खींच लिया ।
“ एजाज, एक मिनट में उठकर तैयार हो जाओ ! बहुत देर हो रही है बेटा ।”
उसके अब्बा ने कड़क कर कहा और कमरे से बाहर चले गए, अब तो उसे उठना ही था । वह उठकर चाय पीने लगा जो रखी ठंडी हो रही थी । फिर जल्दी-जल्दी तैयार होकर वह काम के लिए बिना नाश्ता किए ही निकल गया ।
जम्मू कश्मीर के श्रीनगर शहर में स्थित डल झील की खूबसूरती वहाँ की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है । इस झील को श्रीनगर का रत्न भी कहा जाता है । इस झील पर तैरते बाज़ार भी लगते हैं, जहाँ सब्जी, फल आदि बेचे जाते हैं और यह सब शिकारे की मदद से किया जाता है । ‘शिकारा’ एक तरह की नाव होता है । जिसको डल झील की सैर करने के लिए और परिवहन के लिए भी ये इस्तेमाल किया जाता है । श्रीनगर घूमने आए पर्यटकों की पहली पसंद शिकारे की सैर ही होती है । एजाज और उसके अब्बा भी शिकारा चला कर ही अपने परिवार का गुज़ारा करते रहे थे ।
चार लोगों का उनका छोटा सा परिवार था । अनवर अली, उनकी बीवी गुलशन और दो बच्चे, बेटी समीरा और बेटा एजाज । अनवर अली ग़रीब सही लेकिन बहुत ही स्वाभिमानी इंसान थे, कभी किसी का एक रूपया भी रखना वह गुनाह समझते । लेकिन, किसी की मदद करने से कभी पीछे भी नहीं हटते थे । कभी कोई भी उनके दरवाज़े पर आ जाता तो घर में उनके लिए कुछ रहे या ना रहे वो आने वाले को अच्छे से खिला पिला कर ही भेजते । यही वजह थी कि उस बस्ती के सारे लोग ही उनका बहुत आदर करते थे । यही सारे गुण उनके बेटे एजाज में भी कूट-कूट कर भरे थे । जैसे सारे लोग अनवर अली की इज़्ज़त करते थे अब एजाज की भी करने लगे थे ।
क्रमश:
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