“बालमन की संवेदनाओं, कल्पनाशीलता और सकारात्मक दृष्टि का जीवंत साहित्यिक उत्सव”
दिविक रमेश,नोएडा
इस उपन्यास-कड़ी को यदि गौर के साथ पढ़ा जाए तो पता चलेगा कि इसके जानवर पात्र, लोमड़ी मौसी और नटखट बंदर, मनुष्यों के बीच, मनुष्यों से मनुष्य होकर बात नहीं करते बल्कि अपने वास्तविक रूप में ही रहते हैं। वे आपस में ही बातें करते हैं। मनुष्य के बारे में भी। स्थान के बारे में भी। और उनके संवाद बहुत ही स्वाभाविक बने हैं। दूसरे वे अपने ज्ञात चरित्र की मर्यादा में ही रहते हैं।
“दोनों मित्र स्टेशन आ गए। जैसे ही वे स्टेशन पर पहुँचे, ‘लखनऊ-काठगोदाम एक्सप्रेस’ ने सीटी दी। झट से नटखट और मौसी ने दौड़ लगाई और वे आखिरी डिब्बे में चढ़ गए। सौभाग्य से आखिरी डिब्बे में कोई खास भीड़ न थी। नटखट और मौसी एक सीट के नीचे चुपके से घुस गए। उनका डिब्बे में घुसना कोई जान नहीं पाया।”
अब जरा आगे सोचा जाए। मान लो इन्हें भूख लगे तो क्या करेंगे। सामान्य रचना में तो ये किसी मनुष्य से भोजन माँग कर भी खा सकते हैं। लेकिन नहीं, एक उत्कृष्ट रचना में कुछ ऐसा होगा-
“लखनऊ पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो गया था। नटखट मौसी को लेकर विधान सभा भवन की तरफ निकल गया। विधान सभा का आलीशान और शानदार भवन देखकर लोमड़ी मौसी बहुत खुश हुई। फिर नटखट ने उनको ‘हजरतगंज’ की सैर करवाई। शाम के समय हजरतगंज की शोभा का क्या कहना था? दुकानें बिजली के प्रकाश में जगमगा रही थीं। चहल-पहल, शोर-शराबा और धूम-धड़ाके का बोल-बाला था। नटखट ने मौसी को हजरतगंज घुमाया और एक दुकान से कुछ खाने का सामान उड़ाकर खुद खाया और मौसी को भी खिलाया।”
अथवा इसे भी देखिए-
“बाहर आकर नटखट ने चारों ओर दृष्टि डाली। दूर प्लेटफार्म पर कुछ लोग बैठे खा-पी रहे थे। बाकी यात्री स्टेशन से बाहर चले गए थे। मुसाफिरों को खाते-पीते देखकर नटखट को भी भूख लग आई। उसने मौसी से कहा, ”मौसी, पहले कुछ पेट-पूजा कर ली जाए, फिर आगे का प्रोग्राम बनाएँ।”
मौसी ने नटखट की बात की पुष्टि की। नटखट धीरे-धीरे मुसाफिरों की तरफ चला। वे लोग निश्चिंत बैठे खा-पी रहे थे। नटखट ने अचानक ही झपट्टा मारा और पूड़ी-साग लेकर हवा हो गया। फिर मौसी और नटखट ने एकान्त में बैठकर भोजन किया।”
तो कहा जा सकता है कि रचनाकार अवश्य पशु-पक्षियों आदि अर्थात जानवरों को अपनी रचनाओं में भूमिका दें, लेकिन मयंक जी जैसे रचनाकारों ने जिस रूप में उनके चित्रण का मानदंड स्थापित किया है उसे चुनौती के रूप में स्वीकार भी करें।
उत्कृष्टता के अगले बिंदु के रूप में मैं बाल साहित्य में लोक की खपी हुई ताकत के रूप में कहना चाहूँगा जिसे स्थानिकता भी कहा जा सकता है। यह ताकत भाषा के स्तर पर भी ली जा सकती है और शैली, मुहावरे आदि के स्तर पर भी।
‘भक्काटे’ कविता का यह अंश देखिए-
किसकी सबसे ऊपर पहुँची
आसमान छूती है
इसका मंझा कितना अच्छा
कितनी मजबूती है
कटी एक तो शोर हो रहा
भक्काटे
हो-हो चारों ओर हो रहा
भक्काटे
अपनी रचनाओं में प्रयुक्त मयंक जी कुछ शब्द देखिए- भड़-भड़, घोमनघोट, चिटपटिया, चटपट-चटपट, अगड़म-बगड़म, तड़ातड़, धुरड़-घुरड़ आदि। भाषा और शैली की प्रयोगगत स्थानिकता बालसाहित्य को समृद्ध भी किया करती है और उसे अपना एक ताजा निजी वैशिष्ट्य भी प्रदान किया करती है।
क्रमश:
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