“चांद, छलनी और प्रेम – करवाचौथ की अमर प्रतीक्षा का उत्सव”
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सुशीला तिवारी, पश्चिम गांव, रायबरेली
सारांश :
ये करवाचौथ विशेष रचनाएँ प्रेम, आस्था और इंतज़ार की सुंदर अभिव्यक्ति हैं। हर कविता में एक सुहागन के मन की वे भावनाएँ झलकती हैं, जो अपने प्रियतम के दीर्घ जीवन के लिए उपवास रखती है। चांद यहाँ केवल आकाशीय पिंड नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और मिलन की पवित्र प्रतीक बनकर उभरता है। आइए, अब इन्हें पढ़ें विस्तार से—
मेरा चांद मुझे आया है नजर
सुनो!
आज पूरे एक साल बाद फिर से
कुछ खट्टी कुछ मीठी सुनहरी यादें समेटे हुए ,
करवाचौथ का त्योहार फिर आया है,
मेरे श्याम सलोने प्रियतम को साथ लाया है।
लाल रंग की साडीं पहनकर मैने ,
सुर्ख लाल बिन्दी और सिन्दूर लगाया ,
मेहंदी हांथो में पूर्ण श्रृंगारित होकर
अपने जीवन के चांद के संग उस चांद का इन्तजार,
प्रकृतिक झुरमुट के मध्य से प्रकट लालिमा
चांद निकलने का संकेत मिल रहा था ,
पिया संग प्रेम की साधना उपासना
आंचल फैलाकर लम्बी उम्र की कामना।
#करवाचौथ पिया का साथ हर पल हर साल
जन्म जन्मांतर तक तुम्हारी रहूं चले जब तक सांस ,
चांद का निकलना पिया के साथ दर्शन कर ,
सुंदर सुखद अनुभूति और आन्नद ,
क्यो कि !
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ऐ चांद जरा जल्दी आना
ये चांद जरा तू जल्दी से,
आ जाना आज तो आंगन में।
तेरा रूप सलोना मुझको,
दिखता है अपने साजन में ।
मेंहदी लगाऊंगी, चूड़ी सजेगी,
लाल सिंदूर से मांग सजेगी।
चौक पुराकर #करवा सजा कर
छलनी से साजन को देखूंगी।
श्रद्धा, और विश्वास का रहता है
#करवाचौथ सुहागनों का ब्रत,
लम्बी उम्र की करें कामना,
कार्तिक मास में आता है ये पर्व ।
चंद्र देव का पूजन करके मांगे ये वरदान
मेरे पिया का साथ हमेशा बना रहे भगवान ,
मेरा चांद बड़ा सुंदर मेरा साजन है,
उनसे सदा रहे सुशोभित घर आंगन है।
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चांद छलनी से निहारूं
काश ! मुहब्बत के इन पलों को वक्त रोक पाये ,
चाँद छलनी से निहारूं मेरा महबूब नजर आये ।
मैं मदहोश होकर देखती रहूं बस देखती ही रहूँ ,
कोई थाम ले आके बांहों में मुझे वक्त थम जाये ।
चन्दन सी खुशबू बन महके तेरा नाम लब पर,
थम जाये वो रात तू मेरी धड़कन मे समा जाये ।
सिर्फ प्रेम मुहब्बत इश्क ही नजर आये हर पल,
जीवन का ये समर्पण दुनियाभर को दिखा पाये ।
है तमन्ना दिल ए मेरी ये “सुशीला” सुन लो जरा ,
आंचल को फैलाएं दामन में खुशिया भर जाये ।
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करवाचौथ
प्रेम करने वालों को कितना सताता है चांद।
सही वक्त पर ये नहीं रोज आता है चांद।।
जख्म सीने में उसके भी गहरे-गहरे से हैं ,
फिर भी रोशनी देकर मुस्कुराता है चांद।
इंतज़ारी है क्या ये होती है कैसी उसे न पता,
कभी इसका मतलब नहीं जान पाता है चांद।
जब भी आती है सांझ देखो”करवा चौथ”की,
सभी सुहागनों को जमकर सताता है चांद ।
2 Comments
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बहुत खूब
ना जाने चांद का धर्म क्या है
ईद भी उसका और करवाचौथ भी