“हर दूसरा मोड़, एक नई शुरुआत है।”
प्रस्तुति : शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश:
“दूसरा मोड़” एक भावनात्मक और प्रेरक कहानी है, जहाँ एक निराश लड़की ज़िंदगी से हार मानने ही वाली थी, तभी एक नौजवान उसकी जिंदगी में दूसरा मोड़ बनकर आता है। यह कहानी हमें बताती है कि कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसा मोड़ दिखाती है, जहाँ हार मान लेना आसान लगता है। लेकिन याद रखिए– हर अंधेरा अस्थायी है और हर नया दिन उम्मीद का पैग़ाम लाता है। ‘दूसरा मोड़’ पढ़िए और महसूस कीजिए – ज़िंदगी कितनी कीमती है।
शाम का समय था। दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफिक की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। मेट्रो स्टेशन के पास बने पुल पर एक भीड़ अचानक जमा हो गई थी। किसी ने चिल्लाकर कहा –
“अरे, कोई लड़की पुल की रेलिंग पर चढ़ गई है!”
भीड़ हतप्रभ खड़ी थी। कुछ लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगे। लेकिन कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
लड़की लगभग 20–21 साल की लग रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, बाल बिखरे हुए थे और चेहरे पर गहरी निराशा थी। वह रेलिंग पकड़े हुए नीचे बहती सड़क की ओर देख रही थी।
उसी वक्त वहाँ से आदित्य गुज़रा। आदित्य एक कॉलेज में काउंसलर था, और उसी रास्ते से रोज़ घर लौटता था। उसने जैसे ही भीड़ देखी, वह तुरंत दौड़कर आगे आया।
“रुको, प्लीज़… कोई पास मत जाओ। उसे डराओ मत।” – आदित्य ने भीड़ से कहा।
फिर उसने धीरे-धीरे लड़की के करीब जाते हुए नरम आवाज़ में कहा –
“डियर डॉल, नाम क्या है तुम्हारा?”
लड़की ने गुस्से और दर्द से भरी आवाज़ में जवाब दिया –
“आपको क्या लेना है मेरे नाम से? मुझे छोड़ दीजिए… सब खत्म हो चुका है।”
आदित्य वहीं रुक गया। उसने अपना हाथ रेलिंग पर रखा और बोला –
“खत्म कुछ नहीं होता। जिंदगी हर दिन नया मौका देती है। तुम मानो या न मानो, अभी भी कल तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”
लड़की हंसी की तरह एक कराह निकालती है –
“कल… मेरे लिए कोई कल नहीं है। कॉलेज में सब मुझे ताने मारते हैं। दोस्ती का नाम लेकर धोखा दिया… घरवाले सिर्फ अंक और नौकरी की बात करते हैं। मैं थक गई हूँ। अब और नहीं सहा जाता।”
भीड़ एकदम खामोश थी। कुछ लोग फुसफुसा रहे थे, पर आदित्य ने किसी को पास नहीं आने दिया। उसने गहरी साँस लेकर कहा –
“मैं समझ सकता हूँ। तुम अकेली नहीं हो। पता है, इस वक्त भारत में हर रोज़ सैकड़ों युवा ऐसे ही हार मान लेते हैं। पर तुम अगर अभी कूद गई, तो सोचो… तुम्हारी माँ? तुम्हारे पापा? वो लोग जो तुमसे उम्मीद करते हैं? उन्हें तुम्हारे बिना कैसी जिंदगी जीनी होगी?”
क्रमश:
One Comment
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किसी के कठिनतम समय का आंकलन करना बहुत अजीब है, क्यूंकि हम किसी की मनःस्थिति पुरी तरह नहीं समझ सकते। पर उसके साथ खड़े रहकर थोड़ा दुख बांट कर हम शायद अनिष्ट होने से रोक पाए।