प्रस्तुति : शिखा तैलंग, भोपाल
जो लौटा… मौत से नहीं, उम्मीद से जीता
सारांश :
हिमालय की बर्फीली मौत के बीच, भारतीय पायलट विक्रम मल्होत्रा ने हिम्मत, जज़्बे और उम्मीद के सहारे अपने साथियों की जान बचाई। एक सच्ची इंसानी ताक़त और जज़्बे की प्रेरक कहानी। यह नामुमकिन काम कैसे मुमकिन हुआ, आइए जानें विस्तार से—
चारों ओर बर्फ की चादर थी। नहीं… बर्फ नहीं, वो मौत की सफ़ेद चादर थी, जिसने हिमालय की पूरी घाटी को अपने आगोश में ले लिया था। और उस चादर के बीच, एक तेज़ धमाके की गूंज सब कुछ तोड़ चुकी थी। रात के अंधेरे में पहाड़ कांपे थे। भारतीय वायुसेना का एक सिंगल इंजन रिसर्च विमान, मौसम के अध्ययन के लिए भेजा गया था — पर अब वो बर्फीली घाटी में टूटकर बिखर चुका था।
तेज़ बर्फीली हवा की धारें गूंज रही थीं और उसके बीच एक आवाज़ धीरे-धीरे उभरी — टूटी साँसों के साथ, बेहद दर्द में डूबी हुई — “रचना… अर्जुन…”
पायलट विक्रम मल्होत्रा की आंखें आधी खुली थीं। उसका चेहरा बर्फ से जमे खून से ढका था, पर होश अब भी था। साथ में दो और ज़िंदा थे — वैज्ञानिक रचना देसाई और तकनीशियन अर्जुन नेगी। मगर उनकी हालत भी कुछ बेहतर नहीं थी। अर्जुन का पैर बुरी तरह मुड़ चुका था और रचना काँपती हुई बस बैठी थी, जैसे शरीर ने जवाब दे दिया हो।
“हमें… मदद चाहिए…” रचना ने कांपती आवाज़ में कहा, लेकिन उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था — उसे खुद पर यक़ीन नहीं रहा।
विक्रम ने देखा — अर्जुन चल नहीं सकता और रचना का शरीर सर्दी से पत्थर हो गया था। ये दोनों अब उसके भरोसे थे। उसने बर्फ़ में बैठी रचना की आंखों में झांका, “अगर मैं नहीं गया… तो हम में से कोई नहीं बचेगा।”
“पागल मत बनो विक्रम,” रचना ने उसके हाथ को कसकर थाम लिया, “वो रास्ते नहीं हैं… वो बर्फ़ की मौत है।”
“लेकिन मैं जानता हूँ, वो रास्ते ही हमारी ज़िन्दगी हैं।” विक्रम ने अपना कम्पास निकाला — टूटा हुआ था, लेकिन दिशा अब वो अपने हौसले से तय करने वाला था।
बर्फ़ उसके पैरों में घुस चुकी थी, लेकिन अंदर एक आग जल रही थी। उसने अपनी जैकेट कसकर बाँधी, आँखें मूँदीं, और बर्फ़ में पहला कदम रखा — एक ऐसा कदम, जो मौत के बीच उम्मीद का रास्ता बन गया।
पहला दिन ही उसका इम्तिहान लेने को तैयार था। एक बर्फीली चट्टान से पैर फिसला और वह जोर से गिरा। उसकी हथेली बुरी तरह कट गई — लाल रंग की बूंदें सफेद बर्फ पर फैल गईं, जैसे प्रकृति ने उस पर हँसने की कोशिश की हो। लेकिन विक्रम ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने अपनी कमीज़ का टुकड़ा फाड़ा, घाव पर बाँधा और बिना मुड़े आगे बढ़ गया।
हर कदम पर डर था — बर्फ के नीचे छिपे गड्ढे, अचानक टूटती परतें और आंखों के सामने दूर-दूर तक कोई जीवन नहीं। रात को उसने एक पेड़ के नीचे पनाह ली। शरीर कांप रहा था, साँसे टूट रही थीं, लेकिन आँखें बंद नहीं हो रही थीं — वो दोनों चेहरे, जो पीछे विमान में उसकी राह देख रहे थे, उसके ज़ेहन में छपे थे।
अगली सुबह उसकी नींद भालू की पदचाप से टूटी। ताज़ा निशान बर्फ में बने थे — विक्रम की रगों में सिहरन दौड़ गई। डर जैसे शरीर में समा गया हो।
क्रमश:
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