विजय कुमार तैलंग, जयपुर
मेरे राम
मेरे राम परम सुखदाई!
माना मारा असुर दलों को,
प्रत्यंचा चढ़ाई कर्ण तक,
पर मुस्कान खिली अधरों पर,
हिंसक छवि न कभी दिखाई!
मेरे राम परम सुखदाई!
रावण से भी युद्ध किया पर,
क्रोध अंतस में शमन किया!
पीठ पीछे तूणीर बांधकर,
मुख पर भाव शांति दरसाई!
मेरे राम परम सुखदाई!
भयाक्रांत न छवि राम की,
न भृकुटि पर विचलन पाया!
विपदा कितनी भी आई पर,
मस्तक शिकन न दी है दिखाई!
मेरे राम परम सुखदाई!
पुरुषोत्तम है छवि तिहारी,
सागर जैसा धैर्य समाया!
ज्यों – ज्यों तेरी सूरत देखी,
भक्ति – प्रेम प्रतिमा है पाई!
मेरे राम परम सुखदाई!
सीता बिनु राम – कल्पना,
हनुमत हृदय न कभी समाई!
‘क्षमा’ तुम्हारे अधर की शोभा!
दुनिया मुग्ध खिंची चली आई!
मेरे राम परम सुखदाई!
**************************
गीत प्रेम के
माना कठोर मृदा पे हठात्,
न तरु उपजने पाते हैं!
दर्द भरे आँसूं से सींचे,
उपवन भी खिल जाते हैं!
ऐसे ही निर्दय हृदयों पे,
तब जादू से चल जाते हैं,
जब गीत प्रेम का गाये कोई,
आँसू न रुकने पाते हैं!
तू गीत प्रेम का गाता चल,
अविरल दिगन्त गुँजाता चल!
देखना तेरी इन गून्जों से,
प्रस्तर पे फूल खिल जायेंगे!
रोना ना जाने जो हृदय,
आगाज़ सुन पिघल जायेंगे!
गीतों की तो वो महिमा है,
बादल भी घिर-घिर आयेंगे!
जब हृदय से कोई गाता है,
बंजर भी हरित हो जाते हैं!
बेज़ार हृदय की करुण पुकार से,
जलजले भी आ जाते हैं!
**************************
रसना
रसना, तुम न कभी बहकना!
रसना, तुम न कभी बहकना!
आज तरह तरह के तुमको लेकर
प्रयोग हो रहे!
नीचा दूजे को दर्शाने के
सभी उपक्रम हो रहे!
आज उच्चतम नीचाई की सारी
हदें तो पार कीं!
अपशब्दों की लोगों ने नई
शब्दावली तैयार की!
आज वही सभ्य है जो रसना को
नियंत्रित रखता है!
मूर्खों की भाषा में कभी न
बहस मुहाफ़िज़ा करता है!
व्यक्ति की पहचान बोल से
अहम तुष्टि अनपढ़ करते!
वो चुपचाप निकल हैं जाते
जिनको वे डरपोक समझते!
शांति और सौहार्द बिना बोले भी
कायम होता है!
बोलों से ही नहीं, प्रेम आँखों से
प्रदर्शित होता है!
संयम की तारीफ जहाँ बिगड़े
बोलों की फजीहत है!
वर्तमान में चहुँ दिशाओं में
ये ही एक हकीकत है!
उकसावे पर संयम रखना!
रसना, तुम न कभी बहकना!
One Comment
Comments are closed.
Mohe rang do ram ke nam me