मम्मी—मम्मी पता है? आज संडे है और मयूरी आंटी अपने हसबैंड योगेश के साथ शाहरुख खान
की ब्लॉक बस्टर मूवी जवान देखने गई हैं। अपनी बिटिया शिप्रा की यह बात सुनकर सुकृति के
तन—बदन में मानो आग सी लग गई। वह आह भरते हुए बोलीं।
सुकृति— बेटा! बड़ी खुशनसीब है मयूरी जो उसके हसबैंड उसे संडे को घुमाने—फिराने और
एंजॉय कराने ले जाते हैं। पर मैं क्या करूं? मेरी तो किस्मत ही फूटी है। सुबह—शाम, दोपहर,
वार—त्योहार कुछ भी हो पर मुझे तो रोज सुबह पांच बजे से उठकर अपनी ड्यूटी निभानी
पड़ती है। तुम्हारे पापा मयंक ने जबसे गुलशन अंकल की फैक्ट्री मे एलडीसी की नौकरी पकड़ी
है, तब से वे और ज्यादा बिजी हो गए हैं। हर रोज उनके लिए चाय—नाश्ता, फिर लंच और
रात के लिए डिनर बनाते—बनाते और उनके छोटे भाई मुकुल और उनके दोस्तों के लिए खाना
बनाने और बरतन धोने में ही कब सूरज निकला, कब डूबा, कब चांद निकला, कब डूबा कुछ
पता ही नहीं चलता। वो अच्छा है तुम्हारा स्कूल दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक लगता है
इसलिए थोड़ी राहत रहती है। नहीं तो मेरे उपर काम का बोझ और बढ़ जाता।
अभी सुकृति की यह बड़बड़ाहट चल ही रही थी कि वहां मयंक आ पहुंचे और झुंझलाते हुए बोले
— डियर! तुमने मेरा ब्रेकफास्ट तैयार कर दिया? मुझे डायबिटीज की दवाई लेनी है और उसके
बाद आफिस का काम निपटाने बैठना है। बॉस को दो फाइलें मंडे को आफिस खुलते ही रेडी
करके देनी हैं। नहीं तो वे मेरी जान खा जाएंगे।
मयंक की इन बातों ने मानो आग में और घी डाल दिया। सुकृति तेज आवाज में बोली।
सुकृति—बॉस तुम्हें तो बाद में खाएंगे पर इससे पहले तुम मेरी जान खा जाओगे। यह नहीं देखते
कि अड़ोसी—पड़ोसी कैसे संडे को एंजॉय करते हैं। कोई जवान देखने चला जाता है तो कोई
शहर के झील—झरनों पर पिकनिक मनाने! कोई आज के दिन बाहर खाने—पीने का प्रोग्राम
रखता है तो कोई अपने बच्चों को पिज्जा खिलाने पिज्जेरिया ले जाता है। एक मैं और मेरी बच्ची
कहीं आ—जा नहीं पाते क्योंकि साहब बॉस के गुलाम बन चुके हैं। बस, बॉस के हुक्म का पालन
करते रहते हैं। यह नहीं देखते कि हमारी जिंदगी कैसी कोल्हू के बेल जैसी हो गई है। रोज तो
रोज, संडे को भी चैन नहीं। रोज तो चलो दाल—चावल, सब्जी—रोटी बनाकर जैसे—तैसे मैं
मैनेज कर लेती हूं। पर संडे के दिन साहब की छुट्टी का दिन रहता है। उस दिन और दिनों के
मुकाबले मेरा डबल समय किचन में बीतता है क्योंकि उस दिन साहब को स्पेशल और
गरमा—गरम खाना खाना होता है। धिक्कार है ऐसी जिंदगी पर!
मयंक सुकृति की चुभती बातें सुनकर तैश में आ गया और बोला।
मयंक— बंद करो अपनी बकवास! यदि मैं बॉस का हुक्म नहीं बजाउं तो सैलरी कहां से आएगी?
घर खर्च कैसे चलेगा? कैसे शिप्रा की फोर्थ क्लास की लंबी—चौड़ी फीस भर पाएगी? कैसे
हमलोग आए दिन टपकने वाले रिश्तेदारों की खातिरदारी कर पाएंगे? तुम्हारा काम तो बस
जरा सा है। बस सुबह उठकर झाडू—पोंछा करना, फिर दोपहर का खाना और रात का खाना
बनाना। यही कोई तीन—चार घंटे का ही तो काम है। मुझे देखो, सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक
आफिस का काम संभालना पड़ता है। फिर भी काम बच जाता है तो उसे संडे के दिन निपटाना
पड़ता है। अब ऐसे में कैसे मैं अन्य लोगों की तरह एंजॉय कर सकता हूं?
क्रमश: