लेखक : यशवंत कोठारी, जयपुर
फ्रैक्चर से ज़्यादा दर्दनाक है अस्पताल का बिल – हँसते हँसते सोचने पर मजबूर करने वाली व्यंग्य कथा।
सारांश :
यह व्यंग्यात्मक कहानी एक मामूली फ्रैक्चर, अस्पताल की लूट और डॉक्टरों के धंधे पर गहरा कटाक्ष करती है। बढ़ते हॉस्पिटल बिल, बेमतलब के टेस्ट और मेडिकल इंडस्ट्री की सच्चाई को हास्य के अंदाज़ में पेश किया गया है। अंत में लेखक एक स्थानीय हड्डी पहलवान से इलाज कराकर बच निकलता है।
आइए पढ़िए मेडिकल माफिया और हेल्थकेयर सिस्टम पर आधारित इस हास्य व्यंग्य को विस्तार से –
आखिरी चैप्टर
बिल बना मात्र पन्द्रह हज़ार जिसमे मेरे वहां लेटे रहने का भी खर्च शमिल था.घरवाली ने सब को खबर कर दी बच्चे भागे भागे आये.
डाक्टर दूसरे दिन समझ गया मोटी मुर्गी है धीरे धीरे हलाल करो. अब डाक्टर ने कहा -बाबा बुजुर्ग है ,लगे हाथ सब टेस्ट करा लो. बॉडी का फुल चेकअप का पैकेज सस्ता है मैं और भी कम करा दूंगा.बाबा ने तुम सब को पाला पोसा है अब बाबा के काम पड़ा तो ना नुकर मत करो वैसे भी बाबा के जाने के बाद सब मॉल मत्ता तुम को ही मिलेगा.जाओ पैसे जमा करा दो.
मैं मना करता रहा मगर एक मामूली फ्रेक्चर के लिए पूरी बॉडी का चेकअप हुआ.एक सुंदर सी लड़की घर आकर ही सैंपल ले गयी .दो दिन बाद बाद लम्बी चोडी रिपोर्टों का एक पुलिंदा आया जिसमे कई जगहों पर निशान थे..मैंने बच्चे से कहा इस पर किसी पैथोलोजिस्ट के हस्ताक्षर नहीं है वो बोला –उस से क्या फरक पड़ता है बीमारी तो सिग्नेचर से बदल नहीं जायेगी.बात सही थी.मैंने मान ली.
अब मुझे एक बड़े नामी अस्पताल में डाल दिया गया , और एक लाख रूपये जमा करा दिए गए.हाथ का दर्द का यथावत था.मगर अब हाथ को सब भूल गए थे सब डाक्टर और घरवाले जाँच रिपोर्ट के आधार पर मुझे गंभीर बीमार घोषित कर चुके थे.मैं भी रेडियो अल्ना को ठीक चाहता था मगर कोई सुन ने वाला नहीं था.विशेषज्ञों के अनुसार मैं एक खंडहर था जो कभी एक इमारत थी,वे इस खंडहर रूपी इमारत की मरम्मत करना चाहते थे.
डाक्टरों की एक सेमिनार में मुझे एक केस हिस्ट्री की तरह पेश किया गया ,इसका फायदा इस नामी हॉस्पिटल को मिला और डाक्टर को प्रमोशन भी मिला.डाक्टरों के अनुसार मेरा सड़क पर गिर कर घायल होना एक ऐसी घटना थी जिस पर शोध से नई पीढ़ी को ज्ञान मिलेगा,हाथ का क्या है आज नहीं तो कल ठीक हो जायेगा.
बिल बढ़ता जा रहा था ,मेडी क्लेम निपट गया था,अब घर की पूँजी लग रही थी ,डाक्टरों के खाते में रोज कमीशन जुड़ रहा था,एक दिन तो गज़ब हो गया मेरे डीलक्स वार्ड में डाक्टर की दस विजिट मेरे खाते में दिखा दि गयी.भारी बिल आया.मगर एक पडोसी रोगी ने समझाया –आब आपको डिस्चार्ज कर देंगे.एक अन्य रोगी का परिजन बोला –यहाँ
ऐसा ही होता है रोगी और पैसे जमा कर दो ठीक हो गया तो रोगी को भेज देंगे नहीं अस्थियाँ गंगाजी में डालने हेतु कुरियर से घर भेज देते हैं क्योकि कई रोगियों के परिज़न विदेश में होते हैं और आ नही पाते.विशेषज्ञ डाक्टरों का एक पूरा पैनल राउंड पर आता और बीमारी का गंभीर विश्लेषण करता .
रेडियो अल्ना का दर्द था, हाँ सूजन कम हो गयी थी.डाक्टर इस फ़िराक में थे की एंजियोप्लास्टी कर दे या डायलिसिस कर दे या फिर वेंटिलेटर पर डाल दे.घर वालों की श्रद्धा भी अब थक गयी थी.किसी बहाने मैं अस्पताल से निकलना चाहता था.
एक रोज़ अस्पताल की उबली सब्जी खाने के बाद मैं निकल भागा और सीधे एक स्थानीय हड्डी पहलवान से मालिश करा कर ठीक हो गया.
पहलवान ने लेखक होने नाते फीस भी नहीं ली.लम्बे चोडे बिलों से जान छूटी .लौट के व्यंग्यकार घर को आया .
(काल्पनिक रचना )
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