पंकज शर्मा “तरुण ” पिपलिया मंडी जिला मंदसौर (म. प्र.)
रंगों की बौछार (दोहे)
रंगों की बौछार से,बरसे नेह अपार।
सारा रा रा गा रहे,हुड़दंगी हुरियार।।
आँखें मद माती लगे,पन्नी हाथ गुलाल।
नीला पीला है पुता,जैसे भवन विशाल।।
मस्ती में भुला सभी,सज्जनता के पाठ।
बोतल पकड़े हाथ में,देखे बनता ठाठ।।
भीगी भागी भाभियां,लथपथ रंग गुलाल।
रंगों में मद मस्त हो,रही लड़खड़ा चाल।।
आज मिले हैं सब हृदय,मिटे सभी के बैर।
बैरी झप्पी पा रहे, मना- मना कर खैर।।
पिचकारी ले हाथ में, दौड़ पड़े गोपाल।
राधा छुपने को फिरे,करती शोर बवाल।।
प्रेम और सद्भाव से, अगर मने त्यौहार।
सभी बधाई आज ही,करिए सब स्वीकार।।
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फागुन (कुंडलियां)
आया फागुन मास तो, उड़ने लगी गुलाल।
झूम रहे मद मस्त हो,बन कर अजब सवाल।।
बनकर अजब सवाल, विदूषक सारे लगते।
गाली दे बिंदास, कदम भी खूब बहकते।।
कहे तरुण कविराय, पर्व यह खूब बनाया।
मुर्दों में भी जान, फूंकने को यह आया।।
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पहलू (कुंडलियां)
सिक्के के हैं दो पहलु ,एक नर और नार।
इक दूजे का साथ तो, हो भव सागर पार।।
हो भव सागर पार, न डूबेगी यह नैया।
रखें आपसी प्यार, बनोगे खुद खेवैया ।।
सुनो तरुण की बात,संत सब भी यह लिक्खे।
कभी न आती खोट, स्वर्ण के हैं यह सिक्के।।
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भगवान के जैसा
कभी होता नहीं कोई यहां भगवान के जैसा।
बनाया है तुझे इंसान रह इंसान के जैसा।।
करो कोशिश मगर जी जान से बैठो नहीं खाली।
सदा ही हार उसकी जो जिए नादान के जैसा।।
करे जी जान से मेहनत बहाना है पसीना भी।
वतन को तो सदा लगता वही वरदान के जैसा।।
विचारों को नहीं अशलील बातों में लगाना तुम।
बढ़ेंगे पूर्णता की ओर तब जीशान के जैसा।।
लहू जिसका नहीं उबले वतन को जब जरूरत हो।
लगे हमको वही बिलकुल तरुण शैतान के जैसा।।
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बहुत सुन्दर होली की रचनाएँ