सुशीला तिवारी पश्चिम गांव ,रायबरेली
मां की अरदास
मात रूप परमेश्वरी ,,,,,,,,,,तुम्ही जगत आधार ,
तुम से ही सुख समृद्धि ,,, तुम से है मां प्यार ।
आये मां के नवरात्रा ,पूजन-अर्चन अभिषेक,
ध्यान लगाऊँ दे दो माँ,, विद्या विनय विवेक ।
मइया दर्शन से आपके मिलता सुखद आन्नद ,
जैसे बाग के भ्रमर को ,मिले फूल से मकरंद ।
हे! दुर्गे मइया कष्ट हरो ,,,,,दीजै त्रिविधा ज्ञान,
तेरी कृपा दृष्टी से मां ,,,,,ये जीवन बने महान ।
भक्ति की रीति न जानूँ ,,न पूजा का विधान,
मैं हूँ दासी चरण शरण की ,हरिये मां अज्ञान ।
हम तो हैं अति दीन दुखी ,और बहुत नादान ,
पार करो दास को अपने,दे के अभय वरदान।
माता दुर्गति दूर करो अब ,,,,,,आया तेरे द्वार,
महिमा मांतु लिखती रहूं , भरो सकल भंडार ।
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आराधना
इस मानव जीवन का , मूल मंत्र है योग साधना,
आओ सब मिलकर करें ,देवी मां की आराधना ।
देवी मां की कृपा द्रष्टि से बदले जीवन की धारा ,
वो ही जग की पालन कर्ता , हर लेती दुख सारा ।
महिषासुर का मर्दन कर, शुम्भ निशुंभ को मारा ,
कालजयी मां कालरात्रि, कर दो कल्याण हमारा।
भक्त खड़ा मां दर पर तेरे लेकर आशा की झोली,
भर दो मइया सुख शान्ति सब हे ! माँ मैहर वाली ।
सदा ही रक्षा करी भक्त की बल बुद्धि विद्या देकर,
सही दिशा दिखला दो माता , लगे न दुख ठोकर ।
हम है मैया बालक तेरे राह भटक कर अब आये ,
कृपा द्रष्टि बरसाओ माता जीवन सफल हो जाये।
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जय माता दी
मन सुमन करूं मैं अर्पण,ये जीवन करूं समर्पण,
तेरी जय हो दुर्गे मां,जय जय हो दुर्गे मां।
तुम आदि शक्ति कहलाती,
दीनों के कष्ट मिटाती,
तेरा नित -नित करूं मैं बंदन,
तेरे चरणों की धूल है चंदन,
तेरी जय हो दुर्गे मां,जय जय हो दुर्गे मां।
तुम शेर सवारी करती,
दुष्टों से कभी न डरती,
तेरा भक्त करे अभिनंदन,काटो उर के बंधन,
तेरी जय हो दुर्गे मां,जय जय हो दुर्गे मां।
मैंने सुना है लाखों तारे,
हमें तारों तो जाने तारे ,
तेरी भक्ति में मेरा मन, ये लगा रहे हरदम ,
तेरी जय हो दुर्गे मां, जय जय हो दुर्गे मां।
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आस्था
वैसे तो मैं भी नित्य पूजा- अर्चना करती हूँ ,
ईश्वर पर विश्वास भी रखती हूँ।
व्रत- उपवास भी रखती हूँ ,
लेकिन ईश्वर के सामने बैठकर।
और नेत्रों को बंद करते ही,
ध्यान मग्न होते ही ,
मैं आस्था और अनास्था के
भंवर -जाल में फंस जाती हूँ ।
जबकि आस्था मनोबल बढाती है ,
ईश्वर में मन लगाने के लिए।
हृदय में तमाम तरह के प्रश्न उठने लगते हैं ,
जिनका उत्तर मैं !
ईश्वर के अस्तित्व में खोजने लगती हूँ।
अपने आप को भूलने लगती हूँ।
क्या ये हमारे मन की उथल-पुथल है
अगर नही है तो ,
क्या ये सही है।
बहुत सुंदर ❤️
Super 😊