शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
महंगाई
महंगाई ने इतना मारा हो गई सबकी बे रंग होली
रास नहीं आता कुछ होली की अब हसीं ठिठोली
केवल शिष्टाचार बचा है जिस को हम
दोहराते है
सरोबोर रंगो से करते थे पहले अब
अबीर लगाते है
होली की हुडदंग छुप गया क्योंकि खाली है ये झोली
रास नहीं आता कुछ होली की अब हंसी ठिठोली
खरी खरी मैं कहती हूँ किसी को बुरा
लगे या अच्छा
इससे मुझको फर्क न पड़ता क्यों की
कथन है सच्चा
वाक्यों के बंदूक चलाती शब्द से मारूँ मैं गोली
रास नहीं आता कुछ होली की अब हसीं ठिठोली
^^^^^^^^^^^^
विरह गीत
होली के रंग बेरंग लगे हैं कौन वो देगा रंग
कौन भिगोए चुनरी चोली कौन भिगोए अंग
सबसे पहले तुम ही मेरा सारा
बदन रंग देते थे
कोई दूजा न रंग डारे खुद
ऐसा कर जाते थे
तेरे रंग में रंग जाता था मेरे मन का अनंग
अब तुम सामने आ न सकोगे
पर ऐसा कर जाना
स्वर्ग लोक से रंगो की
कुछ बूंद मुझे बरसाना
पहले सा मेरा मन बनता जाए विहंग।
विरह वेदना हर होली की
कैसे तुम्हें बताऊँ
किस घटना को याद करूँ मैं
और किसे मैं भुलाऊँ
शबनम को आकर कर लेना तंग
^^^^^^^^^^^^
नही डरती
रंगो से मैं डरती नही न डरती हूँ गुलालों से
मैं डरती केवल इन कुछ रंग बदने वालो से
एक ही जैसा लाल लहू सब के नसों में बहता है
फिर क्यों घृणा जाति और ये गोरे कालों से
सुना पढ़ा और देखा भी है कारिस्तानी लोगों का
रौद्र रूप वर्ग भेद भी देखा हमने यहाँ सालों से
किसी पराए से नही डरती वो मुझको छू न सकेंगे
ज्यादा मुझको डर लगता है अपना कहने वालों से
शबनम ज्यादा खतरनाक है इनसे बच कर ही रहना
सदा सदा तुम बच कर रहना सत्ता के दलालों से
^^^^^^^^^^^^
बैर
रंगों के संग हम बैर भी धो लें अबकी होली में
केवल केवल मिश्री घोलें अबकी होली में
मान लो सारे अपने ही है
आज पराया कोई नहीं
किसी की कोई भूल नहीं
आज हुए हैं सारे सही
किसी को परखें न ही तोलें अबकी होली में,,,,
कल की बातें बिसरा दो न
टूटे रिश्ते फिर जोड़ो
प्रेम की गागर रहे सलामत
कोई फिर से ने फोड़े
दरवाजे अब दिल के खोलें अबकी होली में,,,
रंगो का त्योहार ये पावन
आता है हर साल
रंग लगता कोई बांटता
प्रेम , मले गुलाल
प्रेम मिलन की भाषा बोलें अबकी होली में
केवल केवल मिश्री घोलें अबकी होली में