लेखिका: शिखा तैलंग (भोपाल )
सारांश :
रोज़ाना एक जैसे खाने से ऊब चुके कई परिवार, अपने-अपने घरों में खाने को लेकर चल रहे तनाव से परेशान हैं। दीवाली पार्टी में सभी मिलकर निर्णय लेते हैं कि हर सप्ताह एक सामूहिक भोजन आयोजन किया जाए जिसमें सभी अलग-अलग राज्यीय व्यंजन लाएँ। इससे न केवल खान-पान में बदलाव आएगा, बल्कि पड़ोसियों में मेलजोल, दोस्ती और भारतीय संस्कृतिक एकता को भी बढ़ावा मिलेगा।
आइये इमोशनल फैमिली बॉन्डिंग पर आधारित इस दिलचस्प कहानी को विस्तार से पढ़ते हैं –
चैप्टर—1
क्या मम्मी, आज भी वही आलू—चावल? और कुछ नया नहीं बना सकतीं क्या? — योगेश ने
आफिस जाने से पहले टिफिन बनाने की तैयारी में लगी अपनी मां ललिता सिंह से भिनभिनाते
सुर में कहा।
इस पर ललिता बोलीं — बेटा! अब सुबह से ही तो मैं काम में भिड़ी हूं। तुम्हारे पापा बीमार
रहते हैं। अत: उनके लिए परहेजी खाना बनाना पड़ता है। तुम्हारा छोटा भैया मुकेश चटपटा
खाने का शौकीन है। अत: उसके लिए मंचूरियन राइस बनाने पड़ते हैं। अब रह गए तुम और मैं
तो मैंने आलू—चावल चढ़ाकर क्या गुनाह कर दिया। भई, अच्छा खाना चाहिए तो थोड़ा वक्त
देना पड़ता है न। फिर सबकी अलग—अलग फरमाइशी मैं अकेली कहां तक पूरी करती फिरूं?
एक तू है 28 साल का होने को आया, पर अभी तक एक बहू नहीं ला सका। क्या जिंदगी भर मेरे
हाथ का ही खाना खाता रहेगा और ऐसे ही भिनभिनाते रहेगा?
योगेश समझ गया कि अभी मां से ज्यादा बहस करूंगा तो वे भी नाराज हो जाएंगी और घर की
शांति भंग हो जाएगी। ऐसे में उसने चुप रहना ही बेहतर समझा और जैसे ही मां ने टिफिन
बनाकर दिया वह उसे लेकर दफ्तर चला गया।
ठीक ऐसा ही ड्रामा योगेश के पड़ोसी सरदार अमर सिंह के यहां हुआ। हुआ यों कि अमर सिंह
का सुबह से ही मूड खराब था। क्योंकि पिछले दिन उसने चांदनी चौक की दुकान में बैठकर जो
10 हजार रुपये कैश कमाए थे वे उन्हें कहीं रखकर भूल गया था। वह कैश ढूंढ़े जा रहा था और
बड़बड़ाए जा रहा था। पता नहीं, मैंने वो गड्डी किथे रख दी? कभी याद आंदा है कि मैंने उसे
अपने बैग विच रखा सी। कभी याद आंदा है कि उसे संदूक विच रखा सी। हुण संदूक भी वेख
लिया पर गडृडी नहीं मिल रही। पता नहीं कित्थे गया मेरा पैसा?
तभी अमर सिंह की पत्नी सतविंदर ने पूछा — वीरजी! आपके वासते कोभी दे परांठे लाउं? तो
यह सुनकर अमर सिंह और झल्ला गया और वह बोला — एक तो वो गड्डी नहीं मिल रैंदी उपर
से तुम अपणे वही बार—बार बनने वाले कोभी दे परांठे खिलाने पर तुली हो! हुण आज रैण दे
उन परांठा नूं! नईं खाने! जब तक मेरी गड्डी नहीं मिल जांदी मैं नहीं खावांगा!
गड्डी की बात सुनकर सतविंदर कुछ चौंकी। वह बोली— किस गड्डी दे बारे में गल्ल कर रहे हो?
वो जो गराज विच खड़ी रैंदी है या वो जो तुसी कमा के लांदे हो?
सतविंदर का सवाल सुनकर अमर सिंह को थोड़ी हंसी आ गई। वह मुस्कराते हुए बोला — लो
जी, ऐनूं गड्डी और कैश दी गड्डी विच फरक ही नहीं मालूम! ओ मेरी भोली सतविंदर मैं कैश
वाली गड्डी दी गल्ल कर रिया सी!
सतविंदर— तो ऐसे बोलो न! वो मुझे पलंग के नीचे सुबह पड़ी मिली सी सो मैंने उसे उठा के
अपनी अलमारी दे विच रख दीत्ता!
अमर सिंह — धत् तेरी! यह बता के तूने मेरा टेंशन हल्का कर दीत्ता। चल, गड्डी भी लेआ और
कोबी दे परांठे भी। साथ मिलके खावांगे।
उधर, योगेश की मां अपने नित्य कार्यक्रम के अनुसार चूल्हा—चक्की से बरी होकर दोपहर में
अपने पड़ोसी रामनाथन के घर पहुंचीं।
क्रमश:
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