(마당을 나온 암탉, Madangeul Naon Amtak)
“स्वतंत्रता, मातृत्व और साहस की ऐसी कथा, जो हर उम्र के पाठक के हृदय को छू जाती है।”
पुस्तक समीक्षा: दिविक रमेश, नोएडा
इप्स्साक को खेत अच्छा तो लगा लेकिन उसे वहाँ अपना शरीर छिपाने लायक कोई स्थान नहीं मिला। विसेल का भी डर था ही। वह आँगन में आती है, लेकिन पहरेदार कुत्ता उसे वहाँ रहने की इजाजत नहीं देता। वह तो उसे भेदभाव वाली बात तक कह देता है –“ तुम दोनों मुर्गी हो लेकिन एक दूसरे से अलग। तुम्हें यह पता नहीं है? जिस तरह मेरा पहरेदार के रूप जीना और मुर्गे का सुबह उठ कर बांग लगाना स्वाभाविक है. उसी तरह वास्तव में तुम्हारा काम दरबे में अंडा देना है। आँगन में नहीं बल्कि दरबे में! यही नियम है।“
इस पर इप्स्साक अपने पर भरोसा करते हुए कहती है- “ऐसा भी हो सकता है कि यह नियम मुझे पसंद नहीं हो। अगर पसंद नहीं हो तो फिर?”
इस पर अपनी पुरानी सोच का परिचय देते हुए कुत्ता कहता हिए –“बकवास कर रही हो।“ इप्स्साक हार नहीं मानती। उसकी तो प्रबल इच्छा है -अंडा सेकर चूजों का जन्म देखना। वह सोचती है-“ मैं अंडे दूँगी, बिलकुल दूँगी। अगर सिर्फ घोंसला हो तो।“ उसे पता था कि आँगन में रहने वाले जानवर उसे पसंद नहीं करते। अत: उसने आकाशिया के पेड़ के नीचे रहने की सोची जहाँ से वह जानवरों के आँगन को भी देख सकती थी।
उसे जंगली बत्तख की भी याद आती है जिसे अपनी मटमैली रंग की मादा बत्तख के रूप में एक दोस्त मिल चुकी थी। अब कहानी में एक सुखद मोड़ आता है। इप्स्साक को पहाड़ी के नीचे जंगली गुलाब के पेड़ की झाड़ी दिखाई दी। गर्मी से छुटकारे के लिए उसे वह जगह उपतुक्त लगी। वह झाड़ी के पास पहुँची। तभी उसे चीखने की आवाज आई। उसे लगा कि उअसने जंगली बत्तख की चीख सुनी है।
वह डरी लेकिन हिम्मत से काम लिया। सावधानी से गुलाब की झाड़ी के अंदर गर्दन घुसायी। उसने बहुत ही सुंदर कुछ देखा। असल में वह एक बहुत ही सुंदर सफेद अंडा था। आसपास तो कोई था ही नहीं। अंडे की माँ भी नहीं। अंडा अभी तक गर्म था। इप्स्साक ने उसे सेने का निर्णय लिया। रचनाकार के शब्दों में –“ उसका सारा डर गायब हो गया था और उसे राहत महसूस होने लगी। उसे कुछ ऐसा महसूस हुआ जैसा उसे आज तक नहीं हुआ था।
इप्स्साक ने आँखें बंद करके सीने के नीचे दबी जिंदगी को महसूस किया।“ अंडे को सेने को लेकर आगे रचनाकार ने संवेदनात्मक मातृत्व और सृजनशीलता के सुख का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। इप्स्साक ने अंडे तक पर्याप्त गर्मी पहुँचाने के लिए अपनी चोंच से अपनी छाती के बाल तक नोंच डाले। उसे लगा –‘यह मेरा अंडा है।मेरी बात सुन सकने वाला बच्चा। सिर्फ और सिर्फ मेरा अंडा।‘ तभी जंगली बत्तख प्रकट होता है। अकेला। वह उदास है लेकिन इप्स्साक की मदद करता है। उसके लिए रोज मछली पकड़ कर ले आता ताकि इप्स्साक बिना खाने की चिंता किए अंडे को ‘से’ सके। इप्स्साक का भी माँ रूप बहुत अच्छे से उभर चुका था। वह तो अंडे को ढेर सारी कहानियाँ भी सुनाती थी और लोरी भी गाती थी।
जंगली बत्तख इप्स्साक को खतरनाक विसेल से सावधान रहने को कहता था। वह उसे समझदार मुर्गी भी मानता था। वह हमेशा उसकी सुरक्षा के बारे में चिंतित रहता। दुर्भाग्य से एक दिन विसेल जंगली बत्तख को ही खा गया। इप्स्साक को बहुत बुरा लगा। वह सावधान जरूर थी। आखिर अंडे से चूजा निकल आया। इप्स्साक की खुशी का ठिकाना नहीं था। पता चलता है कि चूजे का पिता जंगली बत्तख ही था और चूजा मुर्गी न होकर बत्तख था। इस जानकारी के बावजूद इप्स्साक मुर्गी के मातृत्व में कोई कमी नहीं आती।
वह सोचती है-‘ मैंने दिल और जान से अंडा सेया और मेरी दिली चाहत थी कि बच्चा पैदा हो। जब यह अंडा था तब से लगातार मैं इससे प्यार करती आ रही हूँ। एक बार भी मैंने संदेह नहीं किया कि अंडे के भ्जीतर क्या है। लेकिन मुर्गी का चूजा नहीं बल्कि बत्तख का बच्चा था। पर इससे क्या हो जाएगा? बच्चा भी मुझे अपनी माँ मानता होगा।‘ वह बच्चे को लेकर बथान या आँगन की ओर आती है।
क्रमश:
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