(마당을 나온 암탉, Madangeul Naon Amtak)
“स्वतंत्रता, मातृत्व और साहस की ऐसी कथा, जो हर उम्र के पाठक के हृदय को छू जाती है।”
पुस्तक समीक्षा: दिविक रमेश, नोएडा
यही कारण था कि अंडे देते समय जो खुशी मुर्गी को होती वह तुरंत उदासी में बदल जाती। दड़बे में रहने वाली यह मुर्गी जब आंगन में बत्तख आदि अन्य प्राणियों सहित मुर्गी और मुर्गे को देखती तो उसके मन में सहज प्रश्न उभरता –“ मैं दड़बे में क्यों रहती हूँ?” उसे नहीं मालूम था कि आँगन वाला मुर्गी का जोड़ा चूजा देने वाली प्रजाति का है। उसे अपनी यह सच्चाई भी नहीं मालूम थी कि अकेले दिए हुए अंडे को कितना भी ‘से’ ले, उसमें से चूजे नहीं निकलते। इतना ही नहीं, जब मालिक उसके खराब अंडे को आँगन की तरफ फेंक देता है और कुता उसे चट कर जाता है तो उस पर जो बीतती है उसका बहुत ही मार्मिक चित्रण किया गया है। वह सोचती है- “बिलकुल अंडे नहीं दूँगी! बिलकुल भी नहीं।“
दूसरे अध्याय ‘दरबे से बाहर’ की शुरुआत में इप्स्साक मुर्गी एक ओर आजादी से आँगन में आने-जाने की कल्पना करती नजर आती है दूसरी ओर उसका अंडे देना बंद हो जाता है। उसे बेकार समझ दड़बे से बाहर निकालने की बात सोची जाने लगी। वह कमजोर हो चुकी थी। मालिक ने उसे बीमार और बेकार समझ अन्य वैसी ही मुर्गियों के साथ एक गड्ढ़े में फेंक दिया। उसका भाग्य अच्छा था। वह जिंदा थी और उसे कहीं से आवाज आ रही थी। उसे भागने के लिए कहा जा रह था। असल में यह आवाज आँगन में रहने वाले जंगली बत्तख की थी। वही उसकी मदद कर रहा था। जंगली बत्तख ने गड्ढ़े के पास दुष्ट विसेल को देख कर अंदाजा लगा लिया था कि वहाँ जरूर कोई जिंदा मुर्गी है। मुर्गी अब दड़बे में नहीं जाना चाहती थी। जंगली बत्तख उसे आँगन में रहने वाले पालतू जानवरों के परिवार के बथान के अंदर ले गया। यूँ जंगली बत्तख खुद वहाँ मेहमान था, मुसाफिर था। इस अध्याय में स्थितियों का बहुत ही सूक्ष्म चित्रण हुआ है।
आँगन में रहने वाले पालतू जानवरों के बीच, कुत्ता आदि जानवरों के बीच इप्स्साक मुर्गी को रहने का विरोध किया जाता है। जंगली बत्तख इप्साक मुर्गी की बहादुरी की प्रशंसा करता है और उसे वहाँ रहने के लिए जोर लगाता है। जानवर मुर्गी से बिमारी फैलने की आशंका जताते हैं और उसे पौल्ट्रीफार्म में ही रहने को कहते हैं। जानवरों के द्वारा इनका मजाक भी बनाया जाता है। यहाँ बहुत ही मनोविज्ञान सम्मत चित्रण हुआ है। जंगली बत्तख सख्ती के साथ इप्स्साक का पक्ष लेता है। बत्तखों का सरदार भी विरोध करता है। आखिर एक मुर्गा आता है और उसे केवल एक दिन रहने की अनुमति दे देता है। इस अध्याय में लेखिका ने बहुत ही विश्वसनीय और मजेदार ढंग से इप्स्साक मुर्गी के वहाँ टिके रहने के संघर्ष और उसके आत्मविश्वास का चित्रण किया है। अंडा सेने की उसकी सहज इच्छा को भी रेखांकित किया है। वह खुद को फिर से मालिक और मालकिन के द्वारा दरबे में डाल देने या फिर उनका भोजन बनने की स्थिति से बचाने में सफल हो जाती है। उसने निर्णय लिया था कि वह अब अच्छी चीजों के बारे में ही सोचेगी। उसे वहाँ के मुर्गा दम्पत्ति का अत्याचार सहना पड़ता है लेकिन वह अपनी भूख मिटाने का प्रबंध कर लेती है।
आँगन के थोड़ी दूर पर स्थित खेतों को वह अपना सहारा बना लेती है। रचनाकार उसकी विजयी तथा आजादी प्रिय मनास्थिति का बहुत ही सुंदर चित्रण करती है- “ इप्स्साक ने दोनों पैरों पर जोर देकर सीना ताना। और ऊँची आवाज में जोर से खुशी पूर्वक कुकडूकु चिल्लाई। मुर्गा दम्पत्ति इतने बड़े खेत के पूरे हिस्से पर अपना राज नहीं चला सकेंगे।“
क्रमश:
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