(마당을 나온 암탉, Madangeul Naon Amtak)
“स्वतंत्रता, मातृत्व और साहस की ऐसी कथा, जो हर उम्र के पाठक के हृदय को छू जाती है।”
पुस्तक समीक्षा: दिविक रमेश, नोएडा
हाल ही में कोरियाई बाल उपन्यास के अनुवाद की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक देखने-पढ़ने में आई है – द्वार के बाहर मुर्गी (कोरियाई नाम: मादांग नाओन आमथाक) जिसकी लेखिका है दक्षिण कोरिया की -ह्वांग सन-मी (Hwang Seon-mi, कोरियाई में: 황선미 ) । इसे 2000 में लिख गया है। हिंदी में अनुवाद किया है कोरियाई भाषा के विद्वान रविकेश और नौशाद आलम ने। प्रकाशक है – मानक पब्लिकेशन प्रा.. लि., नई दिल्ली। ह्वांग सन-मी का जन्म 1963 में कोरिया के छुंगछुंग नामदो प्रांत में हुआ था। हिंदी में इस उपन्यास का शीर्षक ‘बाड़े के बाहर मुर्गी’ अथवा ‘पिंजरे के बाहर मुर्गी’ भी हो सकता था। या फिर ‘मुर्गी जो अपनी उड़ान भरना चाह्ती है’।
उपन्यास में कोरियाई मुर्गी का नाम भले ही कोरियाई है अर्थात इप्स्साक (यह नाम मुर्गी ने स्वयं रखा है – कोरियाई में पत्ते के लिए प्रयुक्त शब्द इप्साग्वी के आधार पर मिलता-जुलता क्योंकि उसे आकाशिया के पेड़, उसके पत्ते और फूल बहुत पसंद हैं), लेकिन हिन्दी अनुवाद में उसका कोरियाई मालिक उसे ‘कुकडूकु’ के नाम से भी पुकारता है।
11 अध्यायों में बँटा यह उपन्यास बहुत ही सुंदर और अर्थपूर्ण चित्रों सहित आकर्षक रूप में प्रकाशित किया गया है। सूचित यह भी किया गया है कि इस कृति की 10 लाख से ज्यदा प्रतियाँ बिक चुकी हैं और यह अनुवाद के रूप में 27 विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध है।
सूत्र रूप में कहा जाए तो यह मातृत्व की इच्छुक एक ऐसी मुर्गी की रोचक कहानी है जो अपने पिंजरे की जिंदगी का प्रतिरोध करती है ताकि स्वतंत्र रूप में जंगल का जीवन जी सके और अपने चूजों का पालन-पोषण कर सके। आजादी, निजता और मातृत्व के मूल्य इस कृति में रेखांकित हुए हैं। उपन्यास में इन सब को पाने के लिए बहुआयामी संघर्ष दिखाया गया है – (एक) अपनी विविशता से खुद का संघर्ष, (दो) मनुष्यों की दुनिया में मनुष्यों की स्वार्थी प्रवृत्ति से संघर्ष और (तीन) जानवरों की दुनिया में अपने विरोधी और दुश्मन जानवरों से छुटकारे और उनसे प्राण रक्षा का संघर्ष। अच्छी बात यह है कि यह संघर्ष मुर्गी के द्वारा अपनी मुर्गी सुलभ शक्ति और सीमा के दायरे में ही किया जाता है। बढ-चढकर अति कल्पना युक्त या उलटे-सीधे तरीके से नहीं। आशा या उम्मीद का भाव निरंतर बना रहता है। माँ का प्यार, आत्मनिर्णय की दृढता और साहस सर्वोपरि रहे हैं। माँ का प्यार तो इतना घना और अद्भुत है कि वह किसी अन्य का अंडा ‘से’ कर प्राप्त बच्चे के लिए भी संघर्ष करने या फिर उसके लिए मर-मिटने को भी तैयार है। एक माँ अन्य माँ और उसके बच्चों के लिए कुर्बानी भी दे सकती है।
कहानी की शुरुआत में ही एक ऐसी मुर्गी इप्स्साक का पता चल जाता है जो व्यावसायिक उद्देश्य के लिए अंडे देने के लिए पाली गई है। मुर्गी का अपने स्तर का प्रतिरोध प्रारम्भ में ही दिख जाता है। बताया गया है –‘ आज खड़ा होना भी मुश्किल था। और यह स्वाभाविक भी था क्योंकि उसने बिना कुछ खाए अंडे दिए थे।‘ वह मालिक और मालकिन की निगरानी में रहती है। वह अपने दड़बे से बाहर आँगन में अन्य प्रणियों को देख भर पाती है। मुर्गी और चूजे भी देखती है। उसका मन होता है कि वह भी अंडा दे, उसे ‘से’ सके और माँ बन सके। वह कैद में बंद पालतू मुर्गी बनने के स्थान पर जंगल में स्वतंत्र जीवन जीने का सपना देखती है। लेखिका ने मुर्गी की मानसिकता का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है- “वह न तो इधर-उधर घूम सकती थी और न ही अपने पंखों को फड़फड़ा सकती थी। इतना ही नहीं, अपने अंडे को ‘से’ ना सकने वाली निराशा के साथ जीते हुए वह उस जाली से कभी बाहर निकली ही नहीं थी। बावजूद इसके, उसके मन में एक इच्छा थी जिसे उसने सबसे छिपा कर रखा था। जब से आँगन में रहने वाली एक मुर्गी ने अंडा फोड़कर प्यारे-प्यारे चूजों को बाहर निकाला और उनको लेकर इधर-उधर घुमाने लगी तभी से इप्स्साक के मन में भी ऐसा करने की इच्छा जाग उठी थी।‘ मुश्किल यह थी कि वह जो भी अंडा देती वह तुरंत ढलान से नीचे चला जाता।
देखा जा सकता है कि मुर्गी अपना प्रकृतिपरक जीवन जीने की इच्छुक थी। उधर पोल्ट्रीफार्म का मालिक है जो अपनी व्यवसायिक सोच की तहत मुर्गी को खिलाने वाले दाने-दाने की कीमत वसूलना चाहता है। वह कहता है –“दाने का भाव फिर बढ़ गया है, जितनी मात्रा में दाना खाती हो उतनी कीमत भी चुकानी चाहिए।“ वह तो यह भी कहता था –“ज्यादा मात्रा में खाओ। ताकि बड़े आकार वाले अंडे दे सको!”
क्रमश:
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