“गलत प्रॉम्पट, सही मनोरंजन — एआई के युग में एक बिंदी भी बदल सकती है जिंदगी!”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
बुंदेलखंड के छोटे से गांव बरखेड़ा खुर्द में यदि किसी व्यक्ति का सबसे अधिक सम्मान था, तो वह थे— मुन्ना बुंदेले उर्फ “एआई वीर”।
मुन्ना की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने जीवन में कभी कोई काम स्वयं करने की आदत नहीं डाली थी। उनका मानना था कि जब दुनिया में एआई आ चुका है, तो इंसान का मुख्य काम केवल खाना, सोना और प्रॉम्पट लिखना रह गया है।
उनके पिता, श्री फत्ते सिंह बुंदेला, अक्सर कहा करते थे—
“बेटा, थोड़ा पढ़-लिख भी लिया कर।”
इस पर मुन्ना गर्व से जवाब देते—
“बाबूजी, अब पढ़ने का जमाना गया। अब तो प्रॉम्पट इंजीनियरिंग का जमाना है।”
फत्ते सिंह जी को आज तक समझ नहीं आया कि यह प्रॉम्पट इंजीनियरिंग कोई पढ़ाई है, बीमारी है या सरकारी योजना।
एक दिन मिडिल स्कूल में गणित के शिक्षक, श्री लल्लूराम त्रिपाठी, बड़ी गंभीर मुद्रा में कक्षा में प्रवेश किए।
उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा—
“गृहकार्य : दशमलव पर 1000 शब्दों का लेख लिखिए।”
पूरी कक्षा में शोक की लहर दौड़ गई।
लेकिन मुन्ना मुस्कुरा रहे थे।
उन्हें विश्वास था कि उनका परम मित्र “एआई महाराज” उन्हें फिर से शिक्षा के महासागर से निकाल लेगा।
घर पहुंचते ही उन्होंने मोबाइल निकाला, एआई खोला और तेजी से टाइप किया—
“दशम लव पर 1000 शब्दों का आर्टिकल लिखो।”
दुर्भाग्य से “दशमलव” की जगह “दशम लव” टाइप हो गया।
लेकिन मुन्ना ने कभी प्रॉम्पट पढ़ने जैसी छोटी-मोटी आदतें विकसित नहीं की थीं।
सिर्फ पांच सेकंड बाद एआई ने उत्तर प्रस्तुत कर दिया।
शीर्षक था—
“मुन्ना बुंदेले और उनके जीवन के दस महान प्रेम : एक मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक अध्ययन”
मुन्ना भावुक हो गए।
“वाह! क्या भाषा है!”
उन्होंने पूरा लेख बिना पढ़े कॉपी किया, प्रिंट निकाला और खुशी-खुशी सो गए।
अगले दिन स्कूल में लल्लूराम त्रिपाठी जी कॉपियां जांच रहे थे।
पहली दो कॉपियां देखकर वे निराश हुए।
किसी ने दशमलव को मुद्रा से जोड़ दिया था, तो किसी ने क्रिकेट के रनरेट से।
लेकिन जब उन्होंने मुन्ना की कॉपी खोली, तो पहले उनके चेहरे पर आश्चर्य आया।
फिर चिंता।
फिर सदमा।
फिर मनोरंजन।
उन्होंने पूरी कक्षा के सामने पढ़ना शुरू किया—
“मुन्ना बुंदेले का पहला प्रेम तीसरी कक्षा में पिंकी से हुआ, क्योंकि उसने मुन्ना को अपनी नई नटराज पेंसिल उधार दी थी।”
पूरी कक्षा ठहाकों से गूंज उठी।
मुन्ना मुस्कुरा रहे थे।
उन्हें लगा कि शायद उनका लेख उत्कृष्ट है।
त्रिपाठी जी ने आगे पढ़ा—
“दूसरा प्रेम रिंकी से हुआ, क्योंकि वह टिफिन में आलू के पराठे लाती थी। मुन्ना ने पहली बार महसूस किया कि प्रेम का रास्ता पेट से होकर गुजरता है।”
अब तो बच्चे बेंचों से गिरने लगे।
मुन्ना का आत्मविश्वास थोड़ा डगमगाया…
क्रमश:
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