“यादों की नमी और बारिश की बूँदों में छिपी हैं दिल की दो सबसे खूबसूरत कहानियां “
मेरा पहला प्यार
ट्रेन की खिड़की से भागते पेड़ देख रहा था कि अचानक तुम्हारा मैसेज आया— “याद है न आज 10 साल हो गए?” हाथ काँप गए। कैसे भूल सकता हूँ 14 फरवरी, 2016। कॉलेज का पहला दिन था। तुम लाइब्रेरी में किताब ढूँढ रही थीं, सीढ़ी पर चढ़ी और फिसल गईं। मैं नीचे था। तुम सीधा मेरी बाहों में। किताबें बिखर गईं, और मेरा दिल भी।
तुमने हँसते हुए कहा था, “थैंक्यू हीरो।” उसी दिन से तुम हीरोइन बन गईं मेरी ज़िंदगी की। तीन साल चाय की टपरी, लास्ट बेंच के नोट्स, बारिश में भीगना और फ्यूचर के सपने— सब साथ देखे। तुमने कहा था, “नौकरी लगते ही घरवालों को मना लेंगे।” मेरी नौकरी लगी बैंगलोर में, तुम्हारी दिल्ली में। दूरियाँ बढ़ीं, पर कॉल कम नहीं हुए। फिर एक दिन तुम्हारा फोन आया। आवाज़ भरी हुई थी।
“पापा ने लड़का देख लिया है। डॉक्टर है। वो मान नहीं रहे राहुल।” मैंने कहा, “भाग चलो।” तुम खामोश रहीं। बस बोलीं, “माँ-बाप की उम्र भर की इज़्ज़त… मैं नहीं तोड़ सकती। मुझे माफ़ कर देना।” आखिरी बार स्टेशन पर मिले थे। तुमने मेरी हथेली पर एक कागज़ रखा और दौड़ गईं। कागज़ पर लिखा था— “तुम मेरा कभी न भूल पाने वाला प्यार हो।” आज दस साल बाद भी वो कागज़ मेरे पर्स में है। शादी मैंने नहीं की।
माँ बहुत रोती है। पर मैं क्या करूँ? किसी और को छूते ही तुम्हारी वो लाइब्रेरी वाली हँसी याद आ जाती है। लोग कहते हैं भूल कर आगे बढ़ जाओ। उन्हें कौन समझाए कि कुछ लोग भूलने केलिए नहीं मिलते। वो बस साँसों में बस जाने के लिए मिलते हैं।
तुम्हारी शादी की तस्वीर मैंने आज तक नहीं देखी। हिम्मत नहीं हुई। बस इतना जानता हूँ, तुम जहाँ भी हो, खुश हो। क्योंकि मेरा प्यार तुम्हें रुला नहीं सकता।
तुम मेरा पहला और आखिरी इश्क़ हो। कभी न भूल पाने वाला।
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पहली बारिश
वो यूँ खड़ी थी जैसे सावन का कोई गीत। लाल साड़ी की सलवटें हवा में हल्के-हल्के काँप रही थीं, और कलाई की लाल चूड़ियाँ बूँदों की थाप पर कोई अनसुनी धुन छेड़ रही थीं। उसने हथेली आगे बढ़ाई, तो लगा मानो आसमान ने खुद उसकी हथेली में उतरने का फैसला कर लिया हो।
एक-एक बूँद उसकी उँगलियों को छूकर फिसल जाती, और वो आँखें बंद कर उस स्पर्श को अपनी रूह तक उतरने देती। होंठों पर जो मुस्कान थी, वो बारिश की नहीं थी। वो उस आज़ादी की थी जो हम सब बचपन के बाद कहीं खो देते हैं। पीछे पेड़ भीग रहे थे, ज़मीन की सौंधी खुशबू हवा में घुल रही थी, पर उसे कुछ ख़बर नहीं थी।
उसके लिए तो पूरी कायनात बस उन चंद बूँदों में सिमट आई थी। ना भीगने का डर, ना बीमार पड़ने की फ़िक्र। बस एक पल था, जो उसका अपना था।
बारिश से, ख़ुद से, और उस पल से। मैं दूर खड़ी बस देखती रही।
सोचा, काश हम सब कभी-कभी दहलीज़ पर यूँ ही खड़े हो पाएँ।
हथेली बढ़ाएँ और ज़िंदगी को कहें, “आ, बरस जा। जितना बरसना है बरस जा। मैं भीगने को तैयार हूँ।”
-सुशीला तिवारी पश्चिम गांव, रायबरेली
(काल्पनिक रचनाएं)
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