मनुष्यता, कल्पना और लोक–संवेदना के अद्वितीय रचनाकार
दिविक रमेश, नोएडा
बाल साहित्य में विनोद कुमार शुक्ल की अनोखी दुनिया
विनोद कुमार शुक्ल का बाल साहित्य उनके समग्र साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। यद्यपि उन्होंने बाल साहित्य में अपेक्षाकृत देर से लेखन प्रारंभ किया, फिर भी उन्होंने जो लिखा वह अत्यंत मौलिक और विशिष्ट है। उनकी बाल रचनाएँ केवल बच्चों के मनोरंजन के लिए नहीं हैं, बल्कि उनमें जीवन, प्रकृति, कल्पना और मानवीय संवेदना का गहरा संसार उपस्थित है।
उनका प्रसिद्ध बाल उपन्यास ‘हरी घास की छप्पर वाली झोंपड़ी और बौना पहाड़’ इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। इसे बच्चों, किशोरों और बड़ों— सभी के लिए उपयुक्त कहा गया है। वस्तुतः यही श्रेष्ठ बाल साहित्य की पहचान भी है कि वह बच्चों के माध्यम से हर आयु वर्ग को प्रभावित करे।
इस उपन्यास की रचना भी रोचक प्रसंग से जुड़ी है। बाल साहित्यकार और संपादक सुशील शुक्ल ने उनसे बच्चों के लिए लिखने का आग्रह किया था। पहले तो उन्होंने कहा कि वे बच्चों के लिए नहीं लिखते, लेकिन बाद में एक पक्षी की डायरी लिखने के आग्रह ने उन्हें प्रेरित किया और उन्होंने पूरा उपन्यास ही रच डाला।
उपन्यास का संसार अत्यंत कल्पनाशील है। इसमें बोलू नाम का बाल पात्र है, पतरंगी चिड़िया है, भैरा है, बीनू है, प्रेम है और कूना जैसी बच्ची है। सभी पात्र अपने व्यवहार और स्वभाव में अलग हैं। उनकी छोटी-छोटी आदतें उन्हें जीवंत बना देती हैं।
भैरा का चरित्र विशेष रूप से रोचक है। वह वास्तव में बहरा नहीं है, बल्कि अनसुना करने की आदत के कारण उसे ‘भैरा’ कहा जाता है। यह छोटी-सी बात लेखक की सूक्ष्म दृष्टि को प्रकट करती है।
उपन्यास में प्रकृति और जीव-जंतु मनुष्यों के साथ बराबरी से उपस्थित हैं। यहाँ गिलहरी चाय पीने आती है, हाथी ग्राहक बन जाता है और पक्षी बच्चों के मित्र हैं। यह संसार पूरी तरह काल्पनिक लग सकता है, लेकिन इसमें लोकजीवन की आत्मा बसती है।
उपन्यास का वातावरण छत्तीसगढ़ की स्थानीयता से गहराई से जुड़ा है। जंगल, बस्ती, मंदिर, सरोवर, पहाड़, पक्षी— सब मिलकर एक जीवंत लोक रचते हैं। भाषा में भी स्थानीय शब्दों का प्रयोग पाठकीय आनंद को बढ़ा देता है।
उपन्यास में वैज्ञानिक जिज्ञासा और कल्पना का सुंदर संतुलन है। बच्चे चंद्रमा को हरी घास की छप्पर वाली झोंपड़ी का पता मानते हैं। यह दृश्य बालमन की कल्पना को प्रकट करता है। वहीं दूसरी ओर बच्चों की बातचीत और उनके प्रश्न उन्हें वास्तविक दुनिया से भी जोड़े रखते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल का बाल साहित्य बच्चों को उपदेश नहीं देता। वह उन्हें सोचने, कल्पना करने और दुनिया को नए ढंग से देखने की प्रेरणा देता है। यही कारण है कि उनका बाल साहित्य हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर माना जाना चाहिए।
क्रमश:
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