“बालमन की संवेदनाओं, कल्पनाशीलता और सकारात्मक दृष्टि का जीवंत साहित्यिक उत्सव”
दिविक रमेश,नोएडा
…सकारात्मक दृष्टि का एक संवेदनशील रूप शेरजंग गर्ग की कविता ‘गधा’ में भी देखा जा सकता है-
गधा
गधा जानवर बड़े काम का
जीवन जीता पर गुलाम का
सबसे ज्यादा मेहनत करता
धोबी के डंडे से डरता
फिर भी कहते लोग गधा है
सीधेपन की यही सजा है
यहाँ मुझे बालकृष्ण भट्ट की एक लघुकथा ‘दिल बहलाव’ की याद हो आई है जिसे मैंने स्रवंती पत्रिका के जुलाई, 2023 अंक में पढ़ा था। कथा यूँ है-
एक स्कूल मास्टर हाथ में बेंत लिए लड़कों को पढ़ा रहे थे। बैंत सीधा कर बोले – “हमारे बैंत के कोने के रूबरू एक गधा बैठा हुआ है।” वह लड़का जो बेंत के रूबरू बैठा हुआ था, बड़ा ढीठ था। फौरन कह उठा – “मास्टर साहब बेंत के दो कोने होते हैं, आप किस कोने का जिकर करते हैं?”
मास्टर बेचारे शर्मिंदा हो चुप हो गए।
इस संदर्भ को मैं, कन्हैया लाल ‘मत्त’ जी की कविता ‘पर्वत और गिलहरी’ की पंक्तियों से समेटना चाहूँगा-
एक बार पर्वत अभिमानी,
चंट गिलहरी से यों बोला-
“है कोई ऐसा दुनिया में,
जिसने मेरे बल को तोला?”
बोझ-भार जंगल का सह ले,
यह तो मेरी ही छाती है,
तू मुझे कितनी छोटी है-
इस पर मुझे हँसी आती है!”
हँसती हुई गिलहरी बोली-
“सुन रे, ऊबड़-खाबड़ टीले!
सचमुच जो कि बड़े होते हैं,
बनते इतने नहीं नुकीले।
हिम्मत है, तो कर मुकाबला,
ये बातें बेकार छोड़ कर,
हार मान लूँगी मैं तुमसे,
दिखा जरा अखरोट तोड़ कर!”
आज के बाल साहित्य के उत्कृष्ट अंश की बात सोचते हैं तो एक और बिंदु हाथ आता है। यह है कि आज हम मनुष्यतेर प्राणियों को अर्थात जानवरों को किस रूप में बाल साहित्य में चित्रित करें कि वे बालक पाठकों का अपनापन भी जीतें, विश्वसनीय भी लगें और पहले के चित्रण से अलग या नवीन भी लगें।
प्रश्न के रूप में यह बिंदु मेरे मन में खासकर तब उठा था जब अपना बाल नाटक ‘बल्लू हाथी का बालघर’ लिखने को तैयार हो रहा था। एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में। बता दूँ कि यह नाटक पहली बार, स्वतंत्र रूप में राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। मैं दुविधा में था कि क्या पशु-पक्षियों को प्रतीक या रूपक बना दूँ। अथवा क्या मानवीकरण के नाम पर मैं उन्हें पशु-पक्षी ही न रहने दूँ। क्या उन्हें मनुष्यों के साथ मनुष्यों की तरह ही संवाद करते हुए दिखाऊँ। क्या पंचतंत्र आदि की परम्परा में एक और कहानी या नाटक लिख दूँ। आखिर, सोचते-सोचते इस निर्णय पर पहुँचा कि इन पात्रों से मैं वैसा ही व्यवहार करवाऊँ जो उनसे वैज्ञानिक दृष्टि से अपेक्षित है। खुद को उनपर आरोपित न करूँ।
यहाँ मैं विशेष रूप से फिर चंद्रपाल सिंह मयंक जी के जानवर पात्रों को लेकर रचे गए बालसाहित्य को ध्यान में लाना चाहूँगा। उनका एक बाल उपन्यास है- ‘लोमड़ी मौसी और नटखट बंदर’।
क्रमश:
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