“बालमन की संवेदनाओं, कल्पनाशीलता और सकारात्मक दृष्टि का जीवंत साहित्यिक उत्सव”
दिविक रमेश,नोएडा
…मैं आराम से निकल जाऊंगा तब
तुम्हारे नीचे-नीचे
घर से स्कूल तक।
न मुझे धूप लगेगी, न बारिश।
हमारे घर में
नहीं है न छाता, सड़क!
किसी लेख में मैंने लिखा था कि समीर गांगुली की, बाल-साहित्य लेखन में कुशल सक्रियता, मेरे लिए भी स्वागत के योग्य और पसंद की है। उनकी लेखनी से विशेष रूप से बाल-कथा (उपन्यास) के क्षेत्र में एक के बाद एक श्रेष्ठ कृति सामने आ रही है।
पहली बार मैंने उनका उपन्यास ‘रंगीली,बुलेट और वीर’ पढ़ा था जिसके केंद्र में स्मार्ट गाँव की संकल्पना है। मैं अभिभूत हुआ था। मैंने लिखा था – “हिंदी के बाल-साहित्य में उत्कृष्ट बाल उपन्यासों की अपेक्षित संख्या नहीं है। ऐसे अच्छे उपन्यासों की तो और भी कमी है जिनका कथानक तथ्यात्मक जानकारी आधारित हो लेकिन जो उपन्यास की विधा में जानकारी प्रस्तुत करने के लिए माध्यम मात्र न होकर हर हाल ‘उपन्यास’ हों।” मुझे खुशी है कि किशोरों के लिए वैज्ञानिक संकल्पना के रूप में कृषि केंद्रित बाल उपन्यास “मिशनग्रीन वॉर” है। यह भी उपर्युक्त कसौटी पर खरा उतरता है।
निश्चित रूप से कित्तने ही और उदाहरण दिए जा सकते हैं जिन्हें कितने ही सजग रचनाकार अपने लिए चुनौती के रूप में भी देख सकते हैं और उस राह पर चलने का प्रयत्न कर सकते हैं।
आज के बाल साहित्य की, उत्कृष्ट के रूप में एक और देन है दृष्टि की सकारात्मकता। अर्थात नकारात्मकता की वर्जना। यहाँ मैं फिर चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ जी की उत्कृष्ट रचनाधर्मिता की बात करना चाहूँगा। ‘मयंक’ जी की उत्कृष्ट बाल कविताओं की एक सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये दृष्टि सम्पन्न हैं। ये कविताएँ बच्चे में शेष से जुड़ाव की राह दिखाती हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो सकारात्मक सोच से सजी हैं। यहाँ मैं विशेष रूप से मयंक जी की एक बाल कविता ‘मेरी इच्छा’ की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा जो 1987 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘पढ़-लिखकर तुम महान बनो’ से है-
यदि मैं जगमग सूरज होता,
तो जग में प्रतिदिन दिन लाता।
पर अपनी जलती किरणों से
मैं जग में आग न बरसाता।
यदि मै चमचम चंदा होता,
तो काली रातें चमकाता,
पर दुखिया के व्याकुल मन को
मैं और न ज्यादा कलपाता।
यदि मैं वन का पंछी होता,
तो फल खाता, गाना गाता,
पर दीन कृषक की फसलों को
नुकसान नहीं मैं पहुँचाता।
मेरे जीवन में प्रभु मुझको,
बस इतना हरदम ध्यान रहे!
मैं सबको सुख ही पहुँचाऊँ,
जब तक इस तन में प्राण रहे।
हम देख सकते हैं कि बालक के मन में कुछ बड़ा, बहुत बड़ा बनने की इच्छा हो सकती है। अब प्रश्न यह है कि यदि वह अपनी इच्छा को पूरा करने का अवसर पा जाए तो कैसा व्यवहार करे। क्या वैसा खराब, जैसा वह बहुत बार अपने बड़ों में देखता है या वैसा जैसा मयंक जी की ऊपर पढ़ी कविता में आया है। मयंक जी की इस कविता को ध्यान से पढ़ेगें तो हम पाएँगे कि यहाँ न अकड़बाजी दिखाने का भाव है और न धौंस जमाने का पाठ है। यहाँ कुछ प्राप्त हो जाने पर अहंकार नहीं आता और न ही दुत्कारने या नीचा दिखाने का भाव जागृत होता है।
क्रमश:
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