“बालमन की संवेदनाओं, कल्पनाशीलता और सकारात्मक दृष्टि का जीवंत साहित्यिक उत्सव”
दिविक रमेश,नोएडा
…ऐसे लिखे साहित्य के बुनियादी कारण खोजने जाएँगे तो पता चलेगा कि वह बहुत बार विषय आधारित होता है। अर्थात विषयों को सामने रखकर लिखा होता है। होमवर्क के लिए अभ्यास की तरह का। आज यह समझना होगा कि बालसाहित्य भी अपनी रचना प्रक्रिया की दृष्टि से बड़ों के साहित्य के समान ही होता है। इसमें भी विषय पर रचना नहीं होती। अर्थात वह विषयाधारित मात्र नहीं होता। वह सजग रचनाकार के द्वारा विषय के अनुभव की कलात्मक अनुभूति होता है। इसी कारण उसमें रचनाकार का निजी वैशिष्ट्य भी होता है, मौलिकता भी होती है और रचाव भी। वह केवल लिखी भर नहीं होती।
इसी को सामान्य शब्दों में नये विषय पर नये प्रकार की रचना कहा जा सकता है। कह लेने दीजिए कि यदि विषय पर ही कविता लिखने की कोशिश की जाएगी तो वह एक और रचना भर बन कर रह जाएगी। साथ ही उसमें कहीं से भी रचनात्मकता नजर नहीं आएगी। बहुत बार विवरण मात्र ही हाथ आता है। विषयवादी सोच को ध्यान में रखकर बहुत बार कहा जाता है कि आजकल राजा रानी, परी, चिड़िया आदि जैसे विषयों पर लिखना पूरानी परम्परा को ढोना है। हमें समझना होगा कि आज की विज्ञान सम्मत खोज को लेकर भी यदि विषय की तरह कोई कविता या कहानी लिखी जाएगी तो वह, आवश्यक नहीं, रचना बन ही जाए। कोरी जानकारी या विवरण प्रधान मात्र बन कर भी रह सकती है। बस उपयोगी भर। कविता या कहानी नहीं।
इस संदर्भ में, मैं अकसर जयप्रकाश भारती की निम्न कविता को उद्धृत किया करता हूँ-
राजा का तो पेट बड़ा था
रानी का भी पेट घड़ा था।
खूब वे खाते छक-छक-छक कर
फिर सो जाते थक-थक-थककर।
काम यही था बक-बक, बक-बक
नौकर से बस झक-झक, झक-झक
क्या यह कविता पारम्परिक ढंग की राजा-रानी पर लिखी कविता है? क्या यहां वही सामंतीय मूल्यों वाला राजा है जिसके सामने जबान खोलना भी अपने को सूली पर चढ़ाने का न्योता देना है? यह प्रजातंत्र के मूल्यों को स्थापित करती हुई एक ऐसी कविता है जिसे पढ़कर ताली बजा-बजा कर मजा लिया जा सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में जो बाल कहानियां संभव हुई हैं उनमें से उत्कृष्ट कहानियां वे हैं जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखी गई हैं, भले ही उनमें परी, राजा-रानी, भूत-राक्षस अथवा पशु-पक्षी इत्यादि भी की उपस्थिति क्यों न हो। मसलन ऐसी कहानियों में यदि राजा-रानी आएंगे तो वे अपने सामंतीय, दमनकारी अथवा क्रूर आदि मूल्यों के साथ स्थापित होने के लिए नहीं आएंगे। इसी प्रकार भूत आदि आएंगे तो वे अंध-विश्वास के भंजन के लिए आएंगे। पशु-पक्षी आदि को समोए कहानियों में भी पुरानेपन अथवा पुरानी शैली को तिलांजलि और अतिवादी कल्पनाशीलता से मुक्ति मिलेगी। यूं भी आज के बाल-साहित्य में कल्पना, कम से कम शैली –शिल्प के धरातल पर विश्वसनीयता की बुनियाद पर टिकी होती है।
एक और कविता जिक्र करना चाहूँगा। चाँद की बात करते हुए भी यह कविता चाँद पर लिखी जा चुकी कितनी ही लगभग समान ढंग की कविताओं से अलाग दिखती है। कविता के रचनाकार हैं -बाल स्वरूप राही। देखिए-
चंदा मामा, कहो तुम्हारी शान पुरानी कहाँ गई,
कात रही थी बैठी चरखा, बुढ़िया नानी कहाँ गई?
सूरज से रोशनी चुराकर चाहे जितनी भी लाओ,
हमें तुम्हारी चाल पता है, अब मत हमको बहकाओ।
है उधार की चमक-दमक यह नकली शान निराली है
समझ गए हम चंदा मामा, रूप तुम्हारा जाली है।
और नीचे एक कविता छाता को ऊद्धृत करने से पहले एक प्रश्न भी रखना चाहूँगा कि क्या कविता का शीर्षक ‘छाता’ हो तथा उसमें छाता की संज्ञा भी आ जाए तो क्या उस कविता का विषय छाता कहा जाए? कविता यूँ है –
छाता
सड़क!
हो जाओ न थोड़ी ऊंची
बस मेरे नन्हें कद से थोड़ी ऊंची।
क्रमश:
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