“बालमन की संवेदनाओं, कल्पनाशीलता और सकारात्मक दृष्टि का जीवंत साहित्यिक उत्सव”
दिविक रमेश,नोएडा
आज यह बात पूरे दावे के साथ कही जा सकती है कि हिंदी का बाल साहित्य भी अपने योगदान के उत्कृष्ट अंश के कारण विश्व के श्रेष्ठ साहित्य से टक्कर लेने में सक्षम हो गया है। लेकिन सच यह भी है कि जो उत्कृष्ट है वह अभी रचनारत बालसाहित्य के रचनाकारों के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण भी है। यह उत्कृष्ट क्या है, इसकी विवेचना की जाए तो हो सकता है विद्वानों में कुछ मतभेद भी मिल जाए, लेकिन वैशिष्ट्य की दृष्टि से बहुत से ऐसे बिंदु देखे जाएँगे जिन पर प्राय: सर्वसम्मति मिल जाएगी। यहाँ मैं अधिकतर अपनी निगाहगत मान्यता को केंद्र में रखकर ही बात करूँगा। हाँ, प्रारम्भ में ही, हिंदी बाल साहित्य के अपने गिने -चुने आलोचकों से, जिनमें डॉ. शकुंतला कालरा, नागेश पाण्डेय ‘संजय, जाकिर अली, भगवती प्रसाद गौतम आदि निरंतर सक्रिय हैं, इतना अनुरोध तो अवश्य करना चाहूँगा कि अब बालसाहित्य के उत्कृष्ट को भी पहचान कर सामाने लाएँ। वह कम भी निकले तो भी कोई बात नहीं।
यह वर्ष अर्थात 2025 बाल साहित्य के एक पुरोधा का जन्मशती वर्ष है। पुरोधा हैं- चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ ( 1925-2000)। सोच रहा हूँ कि इनकी स्मृति को सादर नमन करते हुए, इन्हीं के योगदान के उत्कृष्ट के कुछ उदाहरण केंद्र में रखकर बात शुरु की जाए। इनकी एक मान्यता है जो बाल भारती के जून 1985 में प्रकाशित हुई थी –
“सम्पादकों की ओर से रचना को वापस कर दिये जाने पर मैं कभी निराश नहीं हुआ। नये-नये विषयों को ढूँढ़कर नये प्रकार से अपनी बात करने का सदैव प्रयास किया। मेरा विश्वास है कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में उन्नति करने के लिए दृढ़ निश्चय, निष्ठा तथा सच्ची लगन की आवश्यकता होती है। “
मुझे बाल-साहित्यकार कन्हैया लाल ‘मत्त’ भी याद हो आए हैं। वे भी नवीनता के हिमायती थे। रूढ़ि से हटकर। उनकी ही एक कविता ‘हुआ सवेरा’ की अंतिम पंक्तियाँ हैं-
नई कहानी
सुना जबानी,
पिछले गीत न गा!
‘बदली आई’ कविता में चांद का सुखद प्रयोग देखा जा सकता है।
देवेंद्र कुमार की एक बाल कविता ‘बूढ़ी बुहारी’ को उद्धृत करना चाहूँगा-
बूढ़ी बुहारी आफत की मारी
घूरे पर पड़ी हुई रोती है चुप-चुप
कौन पोंछे आँसू, किससे कहे दु:ख
जीवन में इसने पाया न सुख।
सीकें घिसकर टूट गईं
बंधी डोरी टूटकर गिर गई
पर कभी थी सुंदर, चमकदार
लड़ती थी कूड़े से बार-बार
काम था घर को साफ-सुथरा बनाना
फिर थक-हार कर कोने में चले जाना
घिसते-घिसते घिसकर टूट गई
तो फेंक दी गई घर से बाहर
चलो एक म्यूजियम बनाएँ
बूढ़ी बदरंग झाडुओं को उसमें सजाएँ
लोगों से कहें बूढ़ों को भूल मत जाओ
उन्हें परेशान देखो तो झट हाथ बढ़ाओ
चालू ढंग का बाल-साहित्य लिखने वालों या पसंद करने वालों के ऐसी मौलिक उद्भावनाओं से युक्त रचनाएँ आसानी से गले के नीचे भले ही न उतरें लेकिन आज और भविष्य की रचनाओं की ऐसी रचनाएँ राह खोलती हैं।
मेरी निगाह में यह मान्यता जहाँ एक ओर उत्कृष्ट बाल साहित्य की रचना की राह की प्रदर्शक कही जा सकती है वहीं, ऊपर से सहज-सरल दिखने के बावजूद आचरण में लाने की दृष्टि से बहुत बड़ी चुनौती भी है। लिखने और छपने की जरूरत से अधिक बेताबी रचनाकार की रचनाधर्मिता के लिए हानिकारक होती है। ऐसी चुनौती न स्वीकार करने के कारण ही बहुत सा बाल साहित्य केवल लिखा भर रह जाता है, वह रचा हुआ तक नहीं लगता। कितना तो दोहराव का-सा भी प्रतीत होता है। और स्पष्ट करके कहूँ तो वह घिसा-पिटा, ढर्रेदार आदि होकर ही रह जाता है।
क्रमश:
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