“कभी-कभी एक छोटा-सा नोट भी जिंदगी का सबसे बड़ा सच सामने ला देता है।”
नीलिमा तैलंग, पन्ना (मध्य प्रदेश)
सुमित्रा देवी बस की सीट पर लगभग चेतना-शून्य सी बैठी थीं। बहू द्वारा कहे गए शब्द उनके दिल और दिमाग को तीर की भांति भेद रहे थे।
सुमित्रा देवी के पति का स्वर्गवास हो चुका था। उनके दो बेटे थे, जो प्राइवेट कंपनियों में बड़े अधिकारी थे। पति और उनके नाम जितनी भी संपत्ति थी, वह उन्होंने बहुत पहले ही अपने दोनों बेटों के नाम कर दी थी। गांव की जमीन बेचकर मिले रुपये भी दोनों बेटों में बराबर बांट दिए थे।
अब सुमित्रा देवी पूर्णतः अपने बेटों और बहुओं पर आश्रित हो गई थीं। शुरू में तो सबने उन्हें बहुत प्रेम से रखा, किंतु धीरे-धीरे बहुओं का व्यवहार बदलने लगा और बेटे भी सब कुछ देखकर अनदेखा करने लगे।
आज दोपहर के दो बजने के बाद भी जब किसी ने उन्हें खाने के लिए नहीं पूछा, तो वे बहू के कमरे में गईं। बहू ने झुंझलाकर कहा—
“आखिर कब तक हम आपकी सेवा करते रहेंगे?”
इतना कहकर उसने आधी रोटी और थोड़ा-सा सब्ज़ी का कटोरा उनके सामने पटक दिया। सुमित्रा देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने तय कर लिया कि वे दूसरे बेटे के घर चली जाएंगी। लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए बस का किराया चाहिए था। उन्होंने अपना पुराना संदूक खोला तो उसमें एक मुड़ा-तुड़ा बीस रुपये का नोट पड़ा मिला।
बस के हिचकोलों ने उनकी तंद्रा तोड़ी। कंडक्टर धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था। उन्हें याद आया कि पिछली बार जब वे छोटे बेटे के घर गई थीं, तो पोते के लिए लाई मिठाई और बिस्कुट बहू ने कामवाली को दे दिए थे। पहनने के लिए फटी पुरानी साड़ी पकड़ा दी गई थी। खाना भी सबके बाद मिलता था।
उनकी आंखों से आंसू बह निकले। अब उन्होंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वे किसी बेटे के घर नहीं जाएंगी। लेकिन जाएंगी कहां?
“कहां जाएंगी, माताजी?”
कंडक्टर ने हाथ आगे बढ़ाते हुए पूछा।
घबराकर उन्होंने उसी बस स्टैंड का नाम बता दिया, जहां से वे बस में चढ़ी थीं। कंडक्टर समझ गया कि वृद्धा परेशान है। उसने बड़े प्यार से कहा—
“माताजी, आप गलत बस में बैठ गई हैं। अगला स्टॉप आने पर उतर जाइए, वहां से दूसरी बस मिलेगी।”
अगले स्टॉप पर वह खुद उन्हें सहारा देकर उतार गया। बस स्टैंड के पास एक नीम का पेड़ था। सुमित्रा देवी वहीं बैठ गईं। ठंडी हवा चल रही थी और उनकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
तभी पास की एक चाय की दुकान से लगभग बीस-बाईस वर्ष की एक लड़की उन्हें देख रही थी। वह जल्दी से उनके पास आई और बोली—
“अम्मा जी, आप ठीक तो हैं?”
सुमित्रा देवी कुछ बोल न सकीं। लड़की ने उन्हें पानी पिलाया। थोड़ी देर बाद उन्होंने कांपती आवाज़ में अपनी पूरी कहानी सुना दी।
लड़की की आंखें भर आईं। उसने अपना नाम राधा बताया। राधा पास ही एक छोटे से महिला सहायता केंद्र में काम करती थी, जहां बेसहारा वृद्ध महिलाओं और जरूरतमंद महिलाओं को आश्रय दिया जाता था।
राधा उन्हें अपने साथ उस केंद्र में ले गई। वहां कई वृद्ध महिलाएं थीं, जो अपने परिवारों द्वारा छोड़ी जा चुकी थीं, लेकिन अब वे मिल-जुलकर एक परिवार की तरह रहती थीं। किसी ने उन्हें गर्म चाय दी, किसी ने शॉल ओढ़ा दी।
महीनों बाद सुमित्रा देवी ने पहली बार अपने लिए सच्चा अपनापन महसूस किया।
धीरे-धीरे उन्होंने वहां खुद को संभाल लिया। वे बहुत अच्छा खाना बनाती थीं और सिलाई भी जानती थीं। केंद्र की महिलाओं ने आग्रह किया कि वे सबको अचार और पापड़ बनाना सिखाएं। जल्द ही उनके बनाए अचार और पापड़ आसपास की दुकानों में बिकने लगे।
एक दिन केंद्र की संचालिका ने मुस्कुराते हुए कहा—
“सुमित्रा जी, अब यह आश्रम सिर्फ हमारा नहीं, आपका भी है।”
उनकी आंखें भर आईं।
कुछ महीनों बाद वृद्धाश्रम में “मातृ सम्मान दिवस” का आयोजन हुआ। स्थानीय अखबार के पत्रकार भी आए। उन्होंने सुमित्रा देवी की कहानी सुनी और अगले दिन अखबार में उनकी तस्वीर छपी—
“बीस रुपये के एक मुड़े-तुड़े नोट ने बदल दी एक मां की जिंदगी। आज वही मां कई बेसहारा महिलाओं का सहारा बनी।”
उस तस्वीर में सुमित्रा देवी मुस्कुरा रही थीं।
उनकी मुट्ठी में अब भी वही पुराना बीस का नोट था—
लेकिन अब वह बेबसी का नहीं,
नई जिंदगी और आत्मसम्मान का प्रतीक बन चुका था।
(काल्पनिक रचना)