“जहाँ अपनापन हो, वहीं इंसान की असली पहचान जन्म लेती है।”
श्यामकांत देशपांडे, नागपूर
…बाबूजी ने बिना ज्यादा सवाल किए उसे दुकान के सामने पड़े खाली बोरे पर सोने की जगह दे दी। अगले दिन उसके लिए पुराने कपड़े और एक चादर भी ले आए। अपने मित्र सलीम होटलवाले से कह दिया—
“यार, इस बच्चे को रोज़ खाना खिला देना।”
धीरे-धीरे वह बच्चा दुकान में सफाई करने लगा। एक दिन सफाई करते समय ऊपर की अलमारी से “रघुवंश” नाम की किताब नीचे गिर गई।
बाबूजी मुस्कुराए और बोले—
“अरे, अब से तुम्हारा नाम रघु।”
बस, उसी दिन से वह सबके लिए रघु बन गया।
समय बीतने लगा। घर में पहले तो सबको थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन अम्माजी का दिल जल्दी ही पिघल गया। ठंडी सुबहों में वे उसके लिए चाय भेजना नहीं भूलतीं। दिवाली आई तो घर के बच्चों के साथ उसके लिए भी नए कपड़े आए।
धीरे-धीरे रघु उस घर का हिस्सा बन गया।
वह दुकान का काम सीखने लगा—पहले सफाई, फिर हिसाब-किताब, फिर बैंक का काम। बाबूजी ने उसे पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया। उसने प्राइवेट परीक्षा देकर एम.ए. तक की पढ़ाई पूरी कर ली।
वर्षों गुजर गए। घर के बच्चे बड़े होकर विदेश पढ़ने चले गए। दुकान में अब बाबूजी और रघु ही अधिकतर रहते थे।
एक दिन एक बुजुर्ग व्यक्ति दुकान पर आया। उसने बताया कि वह पिछले पच्चीस साल से अपने भांजे को खोज रहा है, जो भोपाल की गैस त्रासदी के समय लापता हो गया था।
जाँच-पड़ताल के बाद पता चला कि वही बच्चा—रघु—असल में उसी परिवार का खोया हुआ बेटा है। गाँव में उसके नाम काफी जमीन भी थी।
बुजुर्ग ने उससे कहा—
“बेटा, चलो अपने घर चलो। तुम्हारी जमीन-जायदाद तुम्हारा इंतजार कर रही है।”
रघु कुछ देर चुप रहा। फिर उसने शांत स्वर में कहा—
“मामा जी, जमीन-जायदाद आपकी देखभाल में सुरक्षित है तो वही रहने दीजिए। मेरा घर तो यही है… बाबूजी और अम्माजी के पास। अगर उन्होंने उस दिन मुझे अपनाया न होता, तो शायद मैं आज कहीं भी न होता।”
बुजुर्ग व्यक्ति भावुक होकर लौट गया।
कुछ दिनों बाद किसी ने रघु को फोन पर कहते सुना—
“भैया, बाबूजी ने मुझे पढ़ाया, जीवन दिया, सम्मान दिया। उन्होंने मुझे सिखाया कि इंसान की असली पहचान उसकी जाति या धर्म नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत होती है।”
अब रघु बड़ा हो चुका था—रघुवीर।
सुनयना के बच्चे उसे “मामाजी” कहते थे। हर सुबह वह उन्हें लेकर कमला पार्क घूमने जाता और उसी मील के पत्थर की ओर इशारा करके कहता—
“देखो बच्चों, यहीं मुझे बाबूजी मिले थे… और यहीं से मेरी नई ज़िंदगी शुरू हुई थी।”
उसकी आँखों में कृतज्ञता और चेहरे पर संतोष की मुस्कान होती।
क्योंकि उसने समझ लिया था—
इंसान की असली पहचान उसका जन्म नहीं, बल्कि उसका कर्म और उसका अपनापन होता है।
और यही इस कहानी का सकारात्मक संदेश है—
✨ इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं, और प्रेम से बड़ा कोई रिश्ता नहीं।
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