“जहाँ अपनापन हो, वहीं इंसान की असली पहचान जन्म लेती है।”
श्यामकांत देशपांडे, नागपूर
पुराने भोपाल में “महिष्मति प्रकाशन” केवल एक प्रकाशन संस्था नहीं, बल्कि संस्कृति, साहित्य और भाईचारे का जीवंत केंद्र था। नवाबों के ज़माने का वह बड़ा-सा हवेलीनुमा घर दिन-रात खुला रहता था। वहाँ साहित्यिक गोष्ठियाँ होतीं, कभी ग़ज़लें गूँजतीं, कभी कविताएँ, तो कभी सुंदरकांड का पाठ और धार्मिक प्रवचन।
हिन्दू-मुस्लिम एकता की ऐसी मिसाल थी कि मोहल्ले में हर त्योहार सबका होता था। ईद पर सिवैयाँ सबके घर जातीं और दिवाली पर मिठाइयों की खुशबू हर गली में फैल जाती। चौक की दुकानों से लेकर इब्राहिमपुरा के यूनानी शफाखाने और वैद्यजी की दवाइयों तक—सबके लिए सबके दरवाज़े खुले रहते थे।
महिष्मति प्रकाशन के मालिक बाबूजी भी उसी संस्कृति के प्रतीक थे। सुबह-सुबह वे कमला पार्क की सैर के लिए जाते, बड़े तालाब के किनारे विठ्ठलदास की बगिया में बैठते, मंदिर में हनुमान चालीसा पढ़ते और फिर दुकान पर लौट आते।
लेकिन एक दिन भोपाल पर एक भयानक त्रासदी टूट पड़ी। छोला रोड के पास एक फैक्ट्री से जहरीली गैस निकल गई। देखते ही देखते जहरीले बादल पूरे शहर में फैल गए। हजारों लोग मौत के आगोश में समा गए। शहर का दिल दहल गया।
चारों ओर अफरातफरी, भय और शोक का माहौल था। कई घर उजड़ गए, कई बच्चे अनाथ हो गए।
इन्हीं दिनों एक सुबह बाबूजी ने कमला पार्क से लौटते समय देखा—बगीचे के कोने में एक मील के पत्थर पर दस-बारह साल का एक बच्चा बैठा है। चेहरा भूख और थकान से भरा हुआ था, लेकिन उसके नाक-नक्श से लगता था कि वह किसी अच्छे परिवार का होगा।
बाबूजी का दिल पिघल गया। उन्होंने पास की बेकरी से उसके लिए टोस्ट मंगवाया।
रात को दुकान बंद करते समय उन्होंने देखा कि वही बच्चा चुपचाप उनके पीछे खड़ा है। उसकी आँखों में डर भी था और उम्मीद भी।
क्रमश:
Shivika means palanquin and Jharokha means window. We have prepared this website with the aim of being a carrier of good thoughts and giving a glimpse of a positive life.
No Comment! Be the first one.