यशवन्त कोठारी, जयपुर
प्राचीन भारतीय स्त्री में भी पुरूष की अपेक्षा प्रेम का गुण कहीं अधिक पाया जाता है। प्रेम को उसके अधिक उद्दात्त अर्थ में समझना स्त्री के लिए ही संभव है संपूर्ण प्रेम की और स्त्री का झुकाव ज्यादा पाया जाता है। शरीर गौण हो जाता है। निष्काम प्रेम की कल्पना ही सहज हो जाती है। प्लेटोनिक प्रेम की व्याख्या भी स्त्री द्वारा सहज रूप में संभव है। एक बार में एक से अधिक व्यक्ति से प्रेम करने की कोशिश को उचित नही कहा जा सकता।
स्वच्छ प्रेम ओर प्रेम की निर्विरोध अभिव्यक्ति भी संभव है। ये अपवाद स्वरूप ही सामने आते है। संतोष प्रद प्रेम सम्बन्ध के लिए अभिव्यक्ति आवश्यक है। जीवन को सुखी बनाने में प्रेम की भूमिका का बडा महत्व है। सुखी रहने के लिए जो कारक आवश्यक है प्रेम उनमें से एक महत्वपूर्ण कारक है। इसी प्रकार जीवन साथी के चयन के लिए भी प्रेम एक आवश्यक उपागम है। प्रेम और ख्याति, यश का प्रेम भी एक आवश्यकता के रूप में उभर कर सामने आया है। प्रेम सम्बन्धों का आधार कल्पना में नहीं हो कर वास्वविकता में होना चाहिए।
विवाह नामक संस्था में प्रेम का योगदान है।, कम या अधिक यह बहस का विषय है। विवाह से प्रेम में काम का प्रवेश आसान और आवश्यक हो जाता हैं। संसर्ग की सहज प्रवृति, जीवन प्रेरणा और जीवन के रूप में प्रंसंग का निरूपण किया गया है।
प्रंसंग का विवरण प्रजनन से सम्बन्धित है। प्रसंग मनुष्य की शारिरीक तथा भावात्मक दोनो पक्षों की एक रहस्यमय जटिलता है। यह आत्मिक विकास का एक कारक है। और पूरे चरित्र पर प्रभाव डालता है। प्रसंग को अनेक प्रकार से प्रेरित और प्रभावित किया जाता है। वह व्यक्ति के व्यवहार को निर्धारित करता है।
प्रसंग मनुष्य के लिए आवश्यक है। वह शारिरिक तथा भावनात्मक दोनो पक्षों का एक रहस्य है जो व्यक्तिगत है। तथा अन्य व्यक्तियों से हमारे सम्बन्धों को निर्धारित करता है। प्रसंग व्यक्ति के विकास का एक कारक तो है ही वह पूरे चरित्र को प्रभावित करता है।
(क्रमश:)
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