रचनाकार: सुशीला तिवारी पश्चिम गांव,रायबरेली
होली खेल रहे नन्दलाल
होली खेल रहे नंदलाल संग में राधा युगल किशोरी,
गालों पर मलें गुलाल ,संग में राधा युगल किशोरी।
कैसी धूम मची बरसाने
आये मोहन रंग लगाने
लेके आये ग्वाल- बाल,संग में राधा युगल किशोरी ।
लगते हैं कितने प्यारे
दो नैना हैं कजरारे
सोहे मोर मुकुट वाके भाल,संग राधा युगल किशोरी।
हंस हंस कर करें ठिठोली
और करते आँख मिचौली
रंग डाल रहे हैं मोहे लाल,संग राधा युगल किशोरी।
लिखा गीत “सुशीला” गावें ,
नित मोहन से प्रेम जतावें ,
वारी तुम पर मदन गोपाल,संग राधा युगल किशोरी।
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होली के रंग
कोई रंग लगाओ मुझ पर चढ़े न कोई रंग ,
प्रेम, प्रीत ,अनुराग भरा ही भाये मोहे रंग ।
होली फगुआ खेल रहे उडें अबीर गुलाल,
नीला, पीला औ बासंती रंग ले लिया लाल,
मैं दीवानी होली खेलूं अपने साजन संग,
प्रेम, प्रीत , अनुराग भरा ही भाये मोहे रंग ।
कहीं नफरती रंग चढ़े कहीं प्रेम रंग चढ़ते,
ये जीवन के रंग कई मिलते और बिछड़ते ,
झूम रही मस्ती में टोली भरा उत्साह उमंग,
प्रेम, प्रीत, अनुराग भरा ही भाये मोहे रंग ।
सारे रंग उतर जाते बस प्रेम रंग चढते देखा,
बैर भाव को छोड़ा सबको हंसते गाते देखा ,
ऐसी खेलो “सुशीला”होली कुछ न हो बेरंग ,
प्रेम ,प्रीत , अनुराग भरा ही भाये मोहे रंग ।
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होली में
नही करना किसी से कोई तकरार होली में ।
मुहब्बत बाँटते रहिए मिलेगा प्यार होली में ।।
चलो कुछ गीत गाकर बने पकवान सुंदर से,
पुराने इन रिवाजों का करें ,विस्तार होली में ।
रक्खे सौहार्द आपस में मनायें प्रेम से होली ,
बुराई छोड़कर हम दें कोई, उपहार होली में ।
बधाई तुमने दे दी हमारा हक भी बनता है,
मलेंगे गाल पर रंग हम भी इस बार होली में ।
लगाकर रंग गुलाल रंग दे आज गोरी को,
करेंगे फिर आज इश्क- ए -इजहार होली में ।
चलो मिलके मिटाते हैं सभी आपसी रंजिश,
फूल टेसू के जैसा चटक हो, प्यार होली में ।
प्रेम रंग की पिचकारी रंग दे हम”सुशीला”को,
हटाकर गम की बदली प्रेम,, बौछार होली में ।
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रंग बिरंगी होली
इन्द्र धनुष से रंग लिए पावन होली आई है,
सब मिलकर होली खेल रहे ,,पर मन को मेरे न भाई है ।
अपने मन की बात कहें हम रंगों से डरते है।
जब से फागुन का लगा महीना घर के अंदर रहते है।।
एक सुन्दर आवारा सा झोंका देख के उसको रीझ गई,
खोई उसके खयालों में तन मन से मैं भीग गई ,
प्यारा सा मेरा अहसास था वो पर कहने से डरते है।
जब से फागुन का लगा महीना घर के अंदर रहते हैं।।
दिल के अंदर बस गया वो बाहर नहीं निकल पाया,
फिर होली कभी न खेली दूजा रंग न चढ़ पाया,
प्रेम रंग में ऐसे रंग गई मैं बाकी रंगों से डरते हैं।
जब से फागुन का लगा महीना घर के अंदर ही रहते हैं।।
फिर जीवन भर ये टीस रही एक बार वो मिल जाये,
जी भर उससे होली खेलूं लेकिन फिर न मिल पाये,
अब तो होली आते ही बस उसकी यादों से घिरते हैं।
जब से फागुन का लगा महीना घर के अंदर ही रहते हैं।।