रचनाकार : सुशीला तिवारी ,पश्चिम गांव, रायबरेली
ये बड़ी सी हवेली जो अब जर्जर और वीरान हो चुकी है, उल्लुओं और पक्षियों की डरावनी आवाज़ें रात होते ही भयानक शोर मचाने लगती हैं! अब यहाँ पर कोई नही रहता है ये एक रहस्यमयी हो चुकी है। जी हाँ कभी ये हवेली जब जमींदारी का जमाना था ,बहुत सुंदर और भव्य हुआ करती थी, हवेली के चारो तरफ मैदान और खूबसूरत प्राकृतिक सौंदर्य का नजारा होता था।
विजय सिंह इस हवेली के मालिक और उनके तीन लड़के थे, बहुत सारे नौकर- चाकर भी हुआ करते थे ,विजय की मां थी पिता जी नहीं थे ,पर मां जी बहुत धार्मिक विचारधारा वाली और पूजा-पाठ में विस्वास रखने वाली महिला हुआ करती थी ।
कहते हैं लोग उस हवेली के अंदर एक मायावी तहखाना भी था, जिसके अंदर नीचे जाने के लिए सीढियां होती थी ,वही पर एक तरफ कुआं भी था, बहुत अंधेरा रहता था, रोशनी की कोई व्यवस्था नही थी ,वहाँ पर खजाना होने की वजह से उसी की रोशनी से पूरा तहखाना प्रकाशित रहता था ।
विजय की माता जी पूरे साल भर देशी घी का दीपक नियम और विधान से श्रद्धापूर्वक हर रोज जलाती थी, और कुछ देर तक उसी तहखाने के अंदर एकांत वास में रहती थी, दूसरा कोई व्यक्ति नही जा सकता था, जब दीपोत्सव का त्योहार दीपावली आती थी तो सुबह से ही विजय की माता जी तहखाने में जाकर पूजा-पाठ में व्यस्त हो जाती थी, शाम होते ही गोधूलि वेला में एक बड़ा सा टोकरा भर कर खजाने से खजाना निकाल लेती थी,उसी से खर्च चलता था, फिर पूरे साल पूजा-पाठ करती थी,
धीरे- धीरे विजय की माता जी अधिक वयोवृद्ध होने के कारण अस्वस्थ रहने लगी, पूजा-पाठ बंद हो गया, किसी ने ध्यान नही दिया, कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई, किसी को कुछ बताया नही कि वो कैसे और क्या पूजा-पाठ करती थी, खजाने का मिलना बंद हो गया, परिवार के सभी सदस्य तहखाने में जाने से डरने लगे,खजाना तो सब चाहते थे,पर जाये वहाँ कौन, तहखाने का दरवाजा बंद करके ताला लगा दिया गया ,आर्थिक तंगी आने लगी चूँकि जमींदारी समाप्त हो चुकी थी,पहले वाला रूतबा अब नही रह गया था,
विजय सिंह के दो बच्चे पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी पा गये वो हवेली से दूर अपने-अपने बच्चे लेकर रहने लगे थे,अब रह गया तीसरा लड़का वो उसी हवेली में रहकर छोटा मोटा व्यवसाय करके अपने वयोवृद्ध पिता जी (विजय सिंह)के साथ जीवन यापन करने लगा ।
नौकर चाकर कुछ चले गए कुछ वही हवेली में रहते लगे,क्यों कि हवेली बहुत बड़ी थी ,पहले इन जमींदारों की हथेलियां सुनसान जगह पर हुआ करती थी। काफी मैदान भी हुआ करता था ।
धीरे कई साल बीत गए, विजय और उनकी धर्म पत्नी भी चल बसे, तीसरा लड़का अकेला पड़ गया, उसके दोनो भाई अब बहुत कम आते थे,हवेली पुरानी होने की वजह से जर्जर होकर गिरने लगी ,सारे नौकर जो रह रहे थे वो भी चले गए
अब विजय सिंह का तीसरा लड़का हवेली में डरने लगा,
क्यों कि हवेली में अजीब-अजीब सी हरकते होने लगी थी, तहखाने के इर्द-गिर्द काले सर्प घूमने लगे और रात में जैसे कोई चहल कदमी कर रहा हो, अजीब सी आवाजें आती, कभी बिल्ली के जैसी आवाज, कभी चमगादड़ फडफडाते थे,कभी छोटे बच्चे के रोने की आवाज सुनाई देती।
एक दिन तो हद ही हो गई पप्पू (विजय सिंह का तीसरा बेटा) ने आधी रात में देखा,कि हवेली के अंदर से छम-छम की आवाज धीरे धीरे बाहर निकल कर थोड़ी दूर पर एक कुआं था उसी में धड़ाम की आवाज के साथ अदृश्य हो गया।
सुबह होते ही तीसरा लड़का भी हवेली छोड़कर सदा के लिए अपने भाइयों के पास चला गया।
अब उस हवेली से रोज रात वही घटनाक्रम दुहराता रहता है,
पर वो क्या है जो कुआं पर जाकर अदृश्य हो जाता है।
वो क्या है कौन है किसलिए
ये आज भी एक रहस्य है।
( काल्पनिक कहानी )
2 Comments
Comments are closed.
Maja aa gya padh kr
बड़ी रहस्यमयी कहानी है