( विशेष संदर्भ : दक्षिण कोरिया )
रचनाकार: दिविक रमेश, नोएडा
विषय को ध्यान में रखते हुए, मूल विषय पर आने से पूर्व, अपनी निगाह में कुछ जरूरी बिन्दुओं को सबसे पहले सामने लाना चाहूँगा जो इस प्रकार हैं:
1.विदेश में भारतीय साहित्य पर हमें एकतरफा होकर नहीं बल्कि आदान-प्रदान की दृष्टि से विचार करना चाहिए। इसलिए कि साहित्य किसी भी भूभाग का हो, वह अन्ततः मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करता है, मनुष्यता को बचाने और उसे पूरी संवेदनशीलता के साथ बेहतर से बेहतर बनाता रहता है। किसी भी भूभाग का साहित्य निजी होकर सार्वजनिक या सबके लिए होता है, यहाँ तक कि ब्रम्हाण्ड के हित के लिए होता है।
2. अनुवाद ही आदान-प्रदान का जरूरी और बेहतरीन साधन है जो सृजन के संदर्भ में पुनर्सृजन होता है। अनुवाद के लिए व्यापक और उत्कृष्ट अवसर बनाए रखने के प्रयत्न होते रहने चाहिए। विदेशों के विद्वानों को इस ओर प्रेरित करने के अवसर पैदा करने चाहिए। साथ ही अपने देश की साहित्यिक संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, भारतीय दूतावासों आदि की इस दिशा में सक्रिय भूमिका होनी चाहिए। आर्थिक सहयोग बहुत जरूरी है। भारत के संदर्भ में भारतीय भाषाओं के साहित्य को हिन्दी में उपलब्ध कराने की दिशा में भरपूर काम होना चाहिए। हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो विदेशों में सर्वाधिक पढ़ाई जाती है, अतः वहाँ के हिन्दी शिक्षित विदेशी विद्वान अपनी-अपनी भाषा में भारतीय साहित्य को पहुंचा सकने की स्थिति में आते चले जाएँगे।
3. विदेशी भाषाओं को पढ़ाने जाने वाले विश्वविद्यालयी विभागों में साहित्य पढ़ने और अनुवाद करने के प्रति विशेष रुचि पैदा करने वाली व्यवस्था की जानी चाहिए।
4. फिल्म भी साहित्य के वाहक के रूप में अच्छा साधन हो सकता है।
5.विस्तार से जानकारी के लिए अपनी पुस्तक Some Aspects of Korean and Indian Literature का भी जिक्र किया जिसे विजयाबुक्स, दिल्ली ने प्रकाशित किया है।
कोरिया के इतिहास और गौरव जानने के लिए मूलत: चीनी लिपि में लिखी समगुक सागी ( किम पूसिक, 1075-1151) और समगुक यूसा (इलयोन, 1206-1289) इन दो पुस्तकों का बहुत महत्त्व है। पहली पुस्तक प्राचीन कोरिया के तीन राज्यों से सम्बद्ध इतिहास-ग्रंथ है तो दूसरी प्रचीन कोरिया से सम्बद्ध किंवदंतियों, लोककथाओं और इतिहासपरक लेखे-जोखों का स्मृति-ग्रंथ है।समगुक यूसा कोरिया और भारत के प्राचीन सांस्कृतिक रिश्तों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
इसी ग्रंथ में उपलब्ध, भारत से जोड़ने वाली एक खास कहानी करक अथवा काया या गाया राज्य के राजा किम सूरो और अयोध्या की राजकुमारी (कोरियाई नाम –हो ह्वांग ओक) के विवाह की है। इस कहानी से भी दोनों एशियाई देशों के सांस्कृतिक मूल्यों की प्रतिस्थापना होती है। गाया से गया की ध्वनि का मेल होता है। किम सूरो का जन्म अंडे से हुआ बताया गया है जिसका एक आशय उसका गोल पृथ्वी के किसी अन्य हिस्से से आकर बसना या दैवीय गुणों से सम्पन्न होना लिया जा सकता है। इस कहानी को प्राय: काल्पनिक कहानी माना जाता है लेकिन कुछ विद्वान हैं जो इसे सत्य मानते हैं। जो भी हो, इस विवाह के माध्यम से दो देशों के संस्कृतिक मिलन की चाहना का तो पता चलता ही है। इस कथा को किवंदन्ती अथवा मिथक भी मान लिया जाए तो भी कोरियाई लोगों की भारत के साथ अपने सांस्कृतिक संबंध जोड़ने की ललक की पुष्टि तो यह कथा भी कर ही देती है।
क्रमश: