रचनाकार : यशवन्त कोठारी, जयपुर
नहीं, मैं तो तेरे प्यार में अप्रेल फूल हूं। और आया शरमा जाती या शरमाने का अभिनय करती। एक नींबू उठाती और अन्दर भाग जाती।
सेठी साहब भी इस आया से दुःखी थे। मिसेज सेठी, सेठी साहब से दुःखी थी। दोनों का दुःख दूर किया इस सब्जी वाले ने, उसने आया को फांसा और सेठी साहब टापते रह गये।
इधर मिसेज सेठी को अंग्रेजी पढ़ने का शौक चर्राया। रेपिडेक्स ले आई और अंग्रेजी में माई हेड इज राउण्डिंग करने लगी।
मिसेज सेठी की इस हरकत से परेशान कॉलोनी की सभी औरतों ने अंग्रेजी पढ़ना शुरू किया। लेकिन बातचीत साड़ी, ब्लाऊज से आगे नहीं बढ़ सकी।
मोहल्ले में मणिहारा आया। साड़ी वाला आया। नाक में लोंग और चूड़ियों वाला आया। सभी आये और गये, लेकिन मोहल्ले में कोई नया परिवर्तन नहीं कर पाये। आखिर यह बीड़ा मिसेज सेठी ने उठाया।
उसने मोहल्लेदारिनों को अपने यहां चाय पर बुलाया और मोहल्ले के साहित्य में व्याप्त सन्नाटे पर चर्चा की। परिचर्चा आयोजन का भार मेजबान के नाते स्वयं उठाया। मगर बात ज्यादा नहीं बनी, इस कारण वार्तालाप इस तरह हुआ-
चाय । केवल चाय
लेकिन तुमने तो कभी चाय भी नहीं पिलाई।
क्या…..क्या। दस बार तुम मेरे फ्रिज से बर्फ ले गयी हो।
दो बार तुम काफी पी चुकी हो।
फ्रीज की बर्फ के पचास पैसे नकद रख दो फिर बात करो।
कॉफी के दो रुपयों में से पचास पैसे काट लो।
बदजात कहीं की।
बदतमीज कहीं की।
तुम चुप रहो।
तुम चुप रहो।
तुम्हारे यहां शर्मा आता है।
और तुम्हारे यहां वर्मा रात को क्या करता है।
तुम्हारी लड़की ड्राइवर के पास क्या करने गई थी।
और तुम्हारी ननद गैराज में माली के साथ क्या कर रही थी।
तुम चुडैल।
तुम डायन।
तू बेहया।
तुझको रगड़ के रख दूंगी।
अरे जा….जा……..।
हे पाठकों, पनघट पर पुराने जमाने में पूरे गांव चौपाल के समाचार मिलते थे। पनघट बंद हुए, नल के बम्बे लग गए, कॉलोनियां बन गईं, मोहल्ले और मोहल्लेदारियां खत्म हो गई। लेकिन हम वाटरगेटी जनम-जनम के इससे उबर न सके। ये मोहल्ले वालियां आज भी लड़ रही हैं, अचानक मुझे शहर छोड़ना पड़ा। आगे की कहानी फिर कभी लिखूंगा। आमीन।
(काल्पनिक रचना)